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बरसों





ना जाने क्यों कोई साहिल से टकराया बरसों
गुज़रते वक़्त को ठहरा हुआ यू ही पाया बरसों

ना कारवां ना मंज़िल कोई कहीं भी पाया बरसों
इल्ज़ाम हमने खुद ही उठाये यहॉ पे कई बरसों

तुझ से अपने दिल का हाल सुनाया यू ही  बरसों
रोये तेरे संग भी कभी मुस्कुराये हम कई बरसों

जा के वो क्यू ना आये कभी जो गए यहा से बरसों
वो हमें खुद ना कभी ढूंढ पाये अपने घर में बरसों



आराधना राय©
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला