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यू ही सही




उसे मेरा चेहरा इस तरह नागवार गुज़रा
वो मुझे बिना देखे ही सामने से ही गुज़रा

मेरी हर बात का ताल्लुक  उस से  रहा था
सफ़र में अनजान क्यों मुझ से ही रहा था

कितने हसीं ख्वाबों को रोज़ ही तोड़ा उसने
ये दिल ना तोड़ पाया जो  उजड़ा  खुद उसने 

दिल के अरमान थे  चलों नए फूल अब चुनें 
उज़डा सा इक  दयार है उसे सजा के ही चलें

ये तश्नगी मालूम है कुछ पल के लिए ही सही
तड़प सहरा कि है 'अरु' देख लो हमें यू ही सही 
आराधना राय


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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला