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पास तेरे हूँ

                                               


                 पास तेरे हूँ
 
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मेरी आँखों में हो तुम  दिये की लौ की  तरह
तेरे आँगन में लौटी हूँ मैं भी तुलसी कि तरह

मुझे माथे पे ना लगाना तुम चंदन कि तरह
तेरे पास नहीं हूँ में किसी भी बंधन कि तरह

मेरी आखों  में सजोगे  तुम अंजन कि तरह
मेरे हाथों में सजोगे तुम भी कंगन कि तरह

हीरा ना समझना जली हूँ  कोयले कि तरह
मेरे पारस तुम ही सम्हालों यू ही कंचन तरह

लौ बन के जलूँगी तुम्हारी ही संगनी कि तरह
वो चलती रही "अरु" मन से भी मीरा कि तरह

आराधना राय


copyright : Rai Aradhana ©

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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु