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पीड सी



पात पात पर इठलाती प्रहरी
भोर हो कोई सुनहरी

तुम भोर हो पहली किरण कि
और मैं ढलती साँझ सी

कर रही नव किसलय स्वादन
प्रथम रंगिणी विभोर सी

मैं सूर्ये नहीं ना  हूँ रत्नाकर
हूँ सूर्ये कि पीड सी
                                                                                                                                                                  तिमिर को सह कर  ह्रदय में
चंद्र कि विभा सी

 मिटा कर आलोक में स्वयं को
 बनी  नव गीत सी

तुम जीवन के प्रयाण का प्राण
मैं अंत हूँ सुरभि सी

छेड़ती है राग-प्रेम बन  "अरु" का
 मानों ह्रदय कि टीस सी
आराधना राय













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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का
आराधना राय

नज्म

उम्र भर के निशा ढूंढते है
ऐ - सहर हम तुझे ढूंढते है तू सितारा है आसमा का 
दर -ब -डर हम तुझे ढूंढते है तू है सागर में भी हु नदिया
तेरे कदमो में पनाह ढूंढते है राते कितनी भी हो गई काली
एक उजाले को हम ढूंढते है ---------------अरु