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गुज़रा


गुज़रा 

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वक़त निकला बहलने बहलाने में जैसा भी गुज़रा
रेत पर जैसे यू ही वो हँस कर अभी अभी ही गुज़रा

वो मेरी दिल कि राह गुज़र से हो कर जब भी गुज़रा
वो मेरे जिस्म को नहीं मेरी  रूह को छू कर ही गुज़रा

वो यू  करता रहा डूब कर दूर से प्यार कुछ यू मुझको
 ठंडी फुहार सा दिल पे यू ही वो  दस्तक दे कर गुज़रा

वो यू ही  करता रहा  दूर से बस  प्यार कुछ  मुझको
ठंडी हवा का झोंका सा वो  दिल से ही हो  कर गुज़रा

उसकी आँखों से देखती हूँ सारा ही ये अनछुआ ज़हान
अधूरा फ़साना थी "अरु" वो मुझे मुकम्मल कर गुज़रा
आराधना राय 
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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय