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बता जाती है

बता जाती है
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बात दिल को छू कर यू  चली जाती है
ज़िंदगी अपनी  कीमत ही बता जाती है
दुनियाँ में  हर शए ही बिकने  जाती है
गर सही कीमत कहीं उसे मिलजाती है

दफ़न , कफ़न , भी जो लोग नहीं पाते है
उनके हिस्सें में बस सिक्के नहींआते है
अस्मत से  किस्मत तक खरीद जाते है
खनकते सिक्कों को खुदा भी कह जाते है

दिल कि उम्मीद पर जीवन जो बिताते है
उनकी क़ीमत तो खुदा भी नहीं लगते है
चाँद तारे भी सामने  मंद से  पड़ जाते है
वो  ही सूरज बन दुनियाँ को  चमकाते है 
आराधना राय 


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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला