Skip to main content

गीत वहीं गाते हो







तुम गीत वहीं फिर गाते हो
जो उर में आन समाता है
उषा कि प्याली में रचे बसे
रश्मि का दीप जलाता है,
अपराह्न समय भानू वीर
अग्नि सा बरस कर जाते है
ग्रीष्म ऋतु से हिय में क्यों
संताप प्रहार कर के जाते है
निशा कि चादर को ओढ़े चंद्र
मन ही मन मुस्काता है
चपल चाँदनी कि आभा से
स्निग्ध् स्नान जग पाता है
निंद्रा कि बाहों में जब मंद
समीर मन को बहलाता है
तारों कि चुनरीया ओढ़े कोई
स्वपन नए से दे जाता है
गीत मुझे हर दिन ही दिवस


रात्रि में भेद बतलाता है
जाने वाले थोड़ा रुक जा
दिन ही रीता सा जाता है
आराधना राय








   


Post a Comment

Popular posts from this blog

कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय