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क्या पाओगे

आज हूँ तुम कल मुझे नहीं तुम पाओगे
मेरी आवाज़ भी सुन नहीं तुम यू पाओगे

दिल ही दिल में तुम भी खूब  पछताओगे
मुझ को खोकर बता तुम यहाँ क्या पाओगे

रूठ कर तुम भला क्या मुझ से दूर जाओगे
ज़र्रे -ज़र्रे में मुझको ही तुम  बिखरा पाओगे

उलझनें अपनी ही खुद तुम यू बढ़ा जाओगे
हर जगह वीरान सी मेरे बगैर तुम पाओगे

ना रो सकोगे तुम फिर ना यू मुस्कुरओगे
दिल के टूटने कि आवाज़ ही सुन पाओगे

मेरे ज़ख़्मों को कुरेद कर तुम क्या पाओगे
मैं जो रोइ तो तुम भी तो अश्क़ बहाओगे

नज़्म  .... आराधना राय


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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला