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सभ्यता के नाम



सभ्यता के नाम
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मेरे आँगन में भोर कि लालिमा छाई
बिटिया तू जिस दिन घर में मेरे आई

मलीन मुख पर क्रांति सी ले कर आई 
मुझे लगा नन्ही परी मेरे घर पर आई

अश्रुओं कि धार  किसी भी ने ना बहाई
तू पूरे  घर को थी मन ही मन में सुहाई

आज में दुनियाँ के रुख को देख घबराई
तीरे किसने  सभ्यता के नाम के चलाये

छींटा कसी देख़ बात ना समझ में आई
क्यों परिधान कि बात यू हर घड़ी उठाई

देखा नहीं महिला विश्व में सार्थक हो गई
कहीं कल्पना ,कही एमली ,तो सैली राइड

किरण अवतरित हो धूमिल नहीं हो पाई
बेटी के अंतस कि बात क्या समझ  पाये

जब किसी क्रांति में एक स्त्री दल होता है
समाज भी जा के वही सगठित होता है

जब कोई बेटे बेटी में अंतर नहीं पाता है
स्त्री पुरुष के नाम कि दुहाई नहीं लगता है 

नव किसलय विचारों का हनन नहीं होता
वही समाज सभ्यता के गीत ही गा पाता है

आराधना राय  





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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु