Skip to main content

सभ्यता के नाम



सभ्यता के नाम
---------------------------------------

मेरे आँगन में भोर कि लालिमा छाई
बिटिया तू जिस दिन घर में मेरे आई

मलीन मुख पर क्रांति सी ले कर आई 
मुझे लगा नन्ही परी मेरे घर पर आई

अश्रुओं कि धार  किसी भी ने ना बहाई
तू पूरे  घर को थी मन ही मन में सुहाई

आज में दुनियाँ के रुख को देख घबराई
तीरे किसने  सभ्यता के नाम के चलाये

छींटा कसी देख़ बात ना समझ में आई
क्यों परिधान कि बात यू हर घड़ी उठाई

देखा नहीं महिला विश्व में सार्थक हो गई
कहीं कल्पना ,कही एमली ,तो सैली राइड

किरण अवतरित हो धूमिल नहीं हो पाई
बेटी के अंतस कि बात क्या समझ  पाये

जब किसी क्रांति में एक स्त्री दल होता है
समाज भी जा के वही सगठित होता है

जब कोई बेटे बेटी में अंतर नहीं पाता है
स्त्री पुरुष के नाम कि दुहाई नहीं लगता है 

नव किसलय विचारों का हनन नहीं होता
वही समाज सभ्यता के गीत ही गा पाता है

आराधना राय  





Post a Comment

Popular posts from this blog

नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का
आराधना राय
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु