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मिट्टी में दफ़न आहट

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इमेज़ साभार गुगल
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मिट्टी में दफ़न किसी की आहट थी
देखा तो वो भी  चाहत किसी की थी

मासूम चेहरा कोई रवानी ढूढ़ता था
हवा का ज़हर भी उसी को सूँघता था

तमाशाई खुद कोई तमाशा देखता था
 मौत का सामान जाने क्यू  बेचता था

शहर में  पसरा जाने क्यों ये सन्नाटा था
 निशाने पर आज भी कत्ल होने वाला था

लूट कर चला गया  क्यू मानने वाला था
हसरतों का जनाज़ा उठने ही ये वाला था

देखा सभी ने ये डोली अभी उठी ही तो थी
दुल्हन सी आग में वो बस जली ही तो थी

आराधना राय








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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

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आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

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दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
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