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जीवन कि धुरी होती है

जीवन कि धुरी होती है
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माँ का दिल होता नहीं औरो सा
दिल के ज़ख्मों को सी लेती है
अश्क़ चुपके से भी पी लेती है
बात कैसी भी हो वो सह लेती है
माँ मर कर भी जी कैसे लेती है
मेरे गुनाहों को माफ़ कर देती है
प्यार कि चादर से ढक वो देती है
किसी बात का गिला नहीं उसको
जो मांगा नहीं वो भी तो दे देती है
 खुदा हो कर भी खुदा कहा होती है
 कभी धरती कभी सागर हो लेती है
माँ जितना भी कहु कम है तेरे लिए
 कभी हारी ना जीती जीवन के लिए
माँ तू यू भी कैसे ऐसे ही ज़ी लेती है
 दूर हो तो जीवन ही दूर सा लगता है
माँ तू ही  इस जीवन कि धुरी होती है
आराधना राय

याद आई
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आज ना जाने क्यू मुंशी प्रेम चंद कि ईदगाह याद आई
हमीद तेरे चिमटे मांगी हो कोई दुआ कही याद हो आई
माँ तेरे प्यार से भीगा मेरा ही आँचल ये ही सदा बस आई
कैसा भी रहा हो  मैला आँचल  बस  बात इतनी समझ आई
नारी तेरा जीवन कैसा भी हो जब तुझ में कहीं माँ नज़र आई
तू मुझे बस यशोदा , कौसल्या ,अनुसूइया , अंजनी नज़र आई
कालकोठरी में देवकी सी , माताजगत जननी ही तू ही कहलाई

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय