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नज़्म -------------तेरे ख़त





आभार गुगल इमेज़


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   तेरे ख़त मुझे आज भी  क्यू  देर तक यू रुलाते है  
 यादों कि कैद में थमीं बातों में  जब मुस्कुराते है 

धुँधले हो चुके स्याह शब्द  कुछ कह से जाते है  
 आँसुओ  के धब्बों में छिपे राज़ हरे से हो जाते है 

  वक़्त के मोड़ पर खड़े यू ही जब कहीं ठहर जाते है  
 उनकी बातों के सायों को इंतज़ार  में खड़े पाते  है 

 कागज़  ना दवात कलम लिखने वाले लिख जाते है  
बातों के अहसास अब किसी के समझ नहीं आते है  

किसी के ऑंसू भी कोई दास्तां नहीं सुना कर  जाते है 
दर्द दिल के दिल में ही दफन से हो कर क्यू रह जाते है 


  आराधना राय  
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का
आराधना राय

नज्म

उम्र भर के निशा ढूंढते है
ऐ - सहर हम तुझे ढूंढते है तू सितारा है आसमा का 
दर -ब -डर हम तुझे ढूंढते है तू है सागर में भी हु नदिया
तेरे कदमो में पनाह ढूंढते है राते कितनी भी हो गई काली
एक उजाले को हम ढूंढते है ---------------अरु