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इल्ज़ाम



 




एक मज़बूरी कितनो को रुला देती है 
कभी सवाल कभी जवाब सुना देती है

रुठते वक़्त में अपना सा बना देती है
 कांपते होठो से  नाम तेरा ही लेती  है

माना गम से दो चार करा भी देती है
कितने इल्ज़ाम दिल में ये उठा देती है 

एक  बे -नूरी पे कालिया खिल जाती है
ये बात दिवार दर दिवार हुई क्यू जाती है

दिल के हालात का रोना क्या रो जाती है
इस जहां को क्यू तू दीवाना बना जाती है



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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु