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कसक





मन कि कसक मन में ही कही  रहती है
इंसानियत परिंदो के मानिंद  ही रहती है 

 मन हिंडोले कि तरह यही बस कहता है 
तू कही भी रहे मेरे आस -पास  रहता  है 

मन में बेचैनियाँ खुमार बेशुमार रहता है 
मैं तेरी हूँ कि नहीं कोई बार बार कहता है 

एक बार ज़ी उठू तेरे साथ पहले कहता है
बात लम्हों कि है क्यों हर बार कहता  है 

आराधना राय  
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला