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उहापोस





रोज़ रोज़ कि उहापोस से मैं स्वयं  डरती हूँ
 ताने -बाने से सपनों के  ही कही बुनती हूँ 

समय कि चोरी होने भी घबराती  नहीं हूँ 
लम्हा लम्हा सा ज़िन्दगी को बांधती हूँ 

डर रही हूँ या मैं अपने में जीती जा  रही हूँ 
यह भी नहीं अब तुझे बहलाना  चाहती  हूँ 

खुल कर विरोध नहीं करती पूछती फिरती हूँ   
अपनों पे मरना  अधिकारों से लड़ना जानती हूँ

पराई पीर भी अब जी कर अभी यहाँ  जीवित रही  
जिस के लिए मर कर जीना भी अब मैं जानती  हूँ  \
आराधना 
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला