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मुक़ाम




साभार गुगल इमेज़

फसल-ए -बहार में ये भी एक मुक़ाम आया है
रास्ता में  देख कर  वो हम  से भी शरमाया  है

उसका  वज़ूद शायद मेरी तलाश में आया है
ख्वाबों में फिर तुझे कहीं कोई फिर भरमाया हैं

रहा यू  वो दूर हमसे क्यों किसे समझ आया है
उसकी ख़ता क्या  कोई समझ भी नहीं पाया  है

किसका ख्याल यहा किसे ढूंढ  कर उसे ले आया है
वक़्त ने इस तरह उसे क्यों किस बात पे रुलाया है


आराधना




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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय