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रेख़्ती *देवनागरी लिपि में





रेख़्ती *देवनागरी लिपि में

चाँद फिर दरीचों से तो  झाँकता है
बात  ख़्वाब सी हर   कोई करता है
आहटें रोज़ सुनती है सूखे -पत्तों कि
वक़्त के आने और तेरे चले जाने कि 

कड़ी बांध कर चलते रहे , सहराओं में
रेत पर चलते रहे ,यू ना जाने कब तक
थे सहे ज़ुल्म मैंने तन्हा साल दर साल
क्यू तेरे आँख में है नमी अब ये आई है। 

आराधना  उर्दू बज़्म में सिर्फ अना  हिंदी नाम का संक्षिप्ति करण।
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु