Skip to main content

मेरी दुनियाँ का नाता,



मेरी दुनियाँ का ये नाता,
हर रोज़ निभाया जाता है
रोज़ मिटा के ये तकदीरे  ,
रोज़ बना  दी जाती है। 

  
हर रोज़ सुबह लगते मेले
हर शाम तमाशे बंद हुये  
हर बार ही परिभाषा  बदली 
हर रिश्ते की ,हर नाते की। 

हर रोज़ यहाँ बाजार सजे 
हर रोज़ ही आई दिवाली 
ये जिस्म ढले ,ये रूह बनी। 
ये सॉस रही ,चलती रूकती।

रुका न  कोई कार्ये व्यापार यहॉ 
मेरे नातो का,मेरे इन रिश्तो का
कोई मोल यहॉ फिर कब  रहता है 
यहाँ रोज़ ही बनते है ये जब  रिश्ते। 

 तेरी दुनियाँ में जब हम  आये है
 देखे तेरा अब तेरा भी ईमान यहाँ 
 जो गए मुसाफिर  इस जग से  ही 
अब उनका फिर शेष निशान  कहाँ। 
आराधना 

प्रेरणात्मक आभार  स्वर्गीय पंडित त्रिवेणी राय।  






Post a Comment

Popular posts from this blog

महज़बीं

महज़बीं
अब हवाए भी तेरा हर घड़ी नाम लेती है 
कभी रातों को कोई ये नया पैग़ाम देती है 

तुझे ही सोचते ज़िंदगी तन्हां बसर हुई है
तुझे ही देखते यू ही उम्र सारी गुज़र रही है 

गर -चे तू फ़लक था मैं यू भी महज़बीं रही हूँ 
"अरु" यू भी सितारों से कोई तो राह गुज़री है 
आराधना राय "अरु" 



महज़बीं -उम्मींद कि किरण -Mehjabin is a bright ray of sunshine after a cloudy day.. 

फ़लक - आसमां , स्वर्ग ,संसार     Falak. Means universe- 
कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला