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इकरार





वो बच गया सौ-सौ ख़ून कर के भी
हम ही  तड़पे   इकरार कर के भी।

न कोई  शिकवा ना कोई  गिला था
 जो मिला  था नसीब से ही मिला था

तुम्हारी पेशानियों  पर, जो सलवटे हैं
मेरी ही सोच के ये सब  सिल-सिले  है

तुम्हारी बातें मेरी ज़हन को लुभाती है
मेरी हर सोच में  कहीं बस से गये  हो

गज़ब सी दांस्ता मेरी अजब आरजू है
न बन सकी कभी , न बिगाड़ी गई  है।

हर एक बात उसकी कुछ लाज़मी सी  थी
अंदाज़ भी बड़ा हीं उसका आशिक़ाना था

यही हर बार हंस कर सोचते क्यों "अना"
जो कल तलक अपना था आज बेगाना  है 

  आराधना ''अना''संक्षिप्त नाम का  उर्दू में अना का मतलब है    self-respect 





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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय