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कवित -परंग


                                    कवित -परंग 



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बोल कोई मीठे कोई बोलता है
वही मन में कहीं समां जाता है
भाव विह्ल हो मूक हो जाते है ,
शब्द नए गढ़ जीवन  पाते  है
कोई  रूप रंग  में ढल जाते है
फिर भावों में सृजन पलता है
सुख सपनों  का यही संसार है
बनता सहज़ जीवन आधार है


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ज़िन्दगी आसान नहीं
फिर भी चलना होगा
रहेंगी बात सदा याद
मुझे अब बदलना होगा



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जाने क्याये  कह जाती है
मुझसे यू  हवा रह रह कर
कौन सी बात उठी सरे बाज़ार
कुछ कह ना सकी रह रह कर

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गीतों के मौसम में
साज़ बन के देखिये
नई इन उम्मीदों  की
परवाज़ फिर ये देखिये
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महज़बीं

महज़बीं
अब हवाए भी तेरा हर घड़ी नाम लेती है 
कभी रातों को कोई ये नया पैग़ाम देती है 

तुझे ही सोचते ज़िंदगी तन्हां बसर हुई है
तुझे ही देखते यू ही उम्र सारी गुज़र रही है 

गर -चे तू फ़लक था मैं यू भी महज़बीं रही हूँ 
"अरु" यू भी सितारों से कोई तो राह गुज़री है 
आराधना राय "अरु" 



महज़बीं -उम्मींद कि किरण -Mehjabin is a bright ray of sunshine after a cloudy day.. 

फ़लक - आसमां , स्वर्ग ,संसार     Falak. Means universe- 
कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला