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कवित -परंग


                                    कवित -परंग 



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बोल कोई मीठे कोई बोलता है
वही मन में कहीं समां जाता है
भाव विह्ल हो मूक हो जाते है ,
शब्द नए गढ़ जीवन  पाते  है
कोई  रूप रंग  में ढल जाते है
फिर भावों में सृजन पलता है
सुख सपनों  का यही संसार है
बनता सहज़ जीवन आधार है


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ज़िन्दगी आसान नहीं
फिर भी चलना होगा
रहेंगी बात सदा याद
मुझे अब बदलना होगा



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जाने क्याये  कह जाती है
मुझसे यू  हवा रह रह कर
कौन सी बात उठी सरे बाज़ार
कुछ कह ना सकी रह रह कर

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गीतों के मौसम में
साज़ बन के देखिये
नई इन उम्मीदों  की
परवाज़ फिर ये देखिये
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का
आराधना राय
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु