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मित्र के नाम पाती



चला काफिला ये अकेले -अकेले
लो अंतिम विदाई  ये अंतिम समय कि
परिणय का सूत्र ही प्रेम होता,नहीं सदा
बात ,प्रणय कि ही होती नहीं है यहाँ
कहते है के मित्र मिलते नहीं
ह्रदय ने सुनी कहीं दूर से आवाज़     
कैसी थी रात,उस अंधकार में
 दुःख कि बातें बनी मित्र का साथ
थी एक कि ,दूसरे कि वहीं मन कि बात
थी जब दुख ने  दुख को आवाज़ दी
आँसुओ को  भी पोंछा, और बात कि               
साथ निरंतर तुम्ही ने बस दिया साथ
दुख कि बात बनी सुख का आधार   
 ना था  कोई  बंधु कोई भी  बात
साथी यहाँ ये कारवां अब  रुकेगा नहीं
चलेगा सदा और  साथ रहेगा  सदा
बात उसकी थी जिसने निभाई सदा
  @  आराधना  कॉपी राइट
मित्र के नाम पाती








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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला