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स्त्री ही स्त्री को नहीं जानती



अपने आप को क्यू नहीं जानती
जंग किससे लड़े क्यू नहीं जानती

दुःख भंजनी ,क्यों  दुःख को  ना हरे
अपने दुखों को ही नहीं क्या जानती

विवाह वेदी अंतिम चिता नहीं बनती
गर हर सास माँ भी बनना जानती

कोई बुढ़ापा गलियों नहीं सिसकता
गर बहु भी कुछ बेटी बनना  जानती

दुहाई  कानूनों को सिर्फ क्यू देती हो
स्वयं को जागृत करना नहीं जानती

लज़्ज़ा से सिर झुकायें स्त्री खड़ी हो
 लाज किसी की ढकना नहीं  जानती

पत्थर जब मारता ये  पुरुष समाज है
साथ मिल कर तुम ताने नहीं मारती

स्त्री ही स्त्री को क्यों फिर नहीं जानती
अपनी श्रेष्ठता स्वयम नहीं पहचानती

आराधना


copyright : Rai Aradhana ©



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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का
आराधना राय
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु