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निपट लूँगी।





 


सुबह होने से  पहले  ही 
मैं अंधेरो से निपट लूँगी।


मेरे दर के तूफानों सुनो 
मैं तुम से भी निपट लूँगी। 

ना करा  अहसास   मुझे 
तू अपने खुदा  होने  का। 

ये  अलग  बात  है  मेरी 
कल  तुझसे निपट लूँगी। 

आराधना 









                              

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
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अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
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सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
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ग़ज़ल

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एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

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आराधना राय