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मान रख जाऊँ





सैकड़ो बार क्यों ठुकराई जाऊँ
कभी निष्कासित करी जाऊँ
 वन-वन   में भटकाई  जाऊँ
किसी राम कि सीता थी क्या
जो  अग्नि परीक्षा भी  दे जाऊँ

नहीं द्रौपदी मैं किसी की भी
जो पांडव मे भी बाँटी जाऊँ
है ये कौन सा साम्राज्य यहाँ
जहाँ रोज़ मैं निगली जाऊँ
कौरवों के साये में रह कर
रोज़ ही दाँव पर खेली जाऊँ

रोज़ अख़बार कि सुर्खियों में
इधर -उधर ही बांची जाऊँ
रद्दी की ढेरों में फेंकी जाऊँ
 चाय कि प्यालियो कि तरह
मेज़ पर बस परस भर दी जाऊँ

भूमि के टुकड़े कि तरह यू ही
भागों में बटती ही चली जाऊँ
श्याम  नहीं तुम   राधा बन जाऊँ
राम नहीं तुम  मैं सीता  बन जाऊँ
नारी हुँ नारी का मान रख जाऊँ

आराधना




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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

अच्छा था

ज़िन्दगी तेरे बिना जी लेते तो अच्छा था
दामन आंसुओं में भिगो लेते तो अच्छा था
सुना कर हाल दिल का रात भर रोये
तुम से राब्ता न होता दिल का तो अच्छा था
दिल धड़कता रहा मगर जुबा चुप थी
मेरे इकरार को इंकार समझ लेते तो अच्छा था
ख़ुशी की महफिले कम पड़ी गम भुलाने में
हमें तुम याद न आते अरु तो अच्छा था

ग़ज़ल

लगी थी तोमहते उस पर जमाने में
एक मुद्दत लगी उसे घर लौट के आने में

हम मशगुल थे घर दिया ज़लाने में
लग गई आग सारे जमाने में

लगेगी सदिया रूठो को मानने में
अजब सी बात है ये दिल के फसाने में

उम्र गुजरी है एक एक पैसा कमाने में
मिट्टी से खुद घर अपना बनाने में

आराधना राय