Skip to main content

विश्वास

                                                             


साभार गूगल इमेज़
                                   (कहानी)            विश्वास 

            उसके पैर मानो जम से गए थे ,शरीर में ताकत न होने पर भी ,वो हॉस्पिटल के कमरे से निकल कॉरिडोर में निकल आई ,उसने सोचा भी  ना था की जिस रिश्ते से जीवन भर की डोर बंधी है वो इस तरह बेमानी हो जायेगे ,अपने आँसूओ को थाम कर शैलजा ने आस पास नज़र दौड़ाई  ,उसके पति  सास , ससुर  डॉ कमरे  मैं बैठे थे , उसकी तरफ उसकी निगाह नहीं थी ,अच्छा मौका देख कर  शैलजा , वहाँ से भाग निकली , हालत के मारो का ठिकाना ,केवल मौत है ,अब तक वो यही जानती थी ,ना चाहते हुए भी उसके कदम अनजान रास्तो पर चल पड़े ।  बिना पति के मायके की दहलीज़ ,खड़ी लड़की का सम्मान क्या और मान क्या , अजीब विडंबना है शादी के समय जिसे दिल से लगा कर विदा करते है , बाद में वही अगर बिना पति के आकर मायके  मे बैठ जाए तो ,समाज ,परिवार दोनों ही उसे  अस्वीकृत कर देते है । शैलजा के लिए उसके माता पिता ने ऊचे घर का , सभ्य ,अच्छी नौकरी वाला वर देख कर विवाह किया था ।
विवाह ऐसा की लोग दांतो तले उॅगली दबा ले ,समृद्धि - सुख और ऐश्वर्य , अच्छे जीवन साथी पाने की सीढ़ी ,
नहीं , यह शैलजा को तब पता चला जब नितिन ने  बातो ही बातों में नए घर के लिए,   रुपयों का  बंदोबस्त  , करने शैलजा को मायके भेज दिया , और रुपयो का इंतज़ाम न होने पर अपना गुस्सा , शैलजा को पीट -पीट
कर उतारा था , जब तक वो बेसुध न हो गई , आँखे खुली तो वो , हॉस्पिटल मे थी ।

अभी होश आया ही था की , उसने सुना , उसके सास ससुर व पति आपस में बाते कर रहे थे " ऐसे कंगालों  से
रिश्ता रखने कि  कोई  ज़रूरत  ही क्या थी, जब गाहे - बगाहे काम ही नहीं आ  सकते। पता नहीं, कौन सी मुसीबत बन कर ,हम पर ही टूटने वाली है
           
    ऐसा सुनते ही शैलजा के होश उड़ गये ,जान बुझ कर आँखे बंद कर वो लेटी  रही , पर अब ना मंज़िल थी ना रास्ता ,  तभी उसे मीना की याद हो आई   , उसी शहर में पास ही मीना का मकान है,रात भर शरण के लिए शायद जगह  मिल जाये ये सोच कर वो मीना के घर चल पड़ी  । बहुत पहचान ना होने पर भी उसे मीना की   सह्रदयता पर  विश्वास था ।                                                                                                                                                                                                                                                                                                सुबह से शाम होने को आई थी, पंछी भी अपने घोसले में जा रहे थे , दिन भर के थके प्राणी घरो को लौट
रहे थे ,पर शैलजा आज बेघर थी उसका आसरा छिन चुका था , माँ -बाप के पास जाती कैसे , डोली से लड़की
जाती  है तो कन्धों पर अर्थी ससुराल से उठती है , यही दुनिया की रीत है ,फिर जाती कैसे ? उसके माता - पिता
कन्धे यूँ ही पहले से  उसके विवाह  में लिए क़र्ज़ से झुके हुये थे । वहाँ जा कर बोझ बनना उसे मंजूर नहीं था ।

चलते चलते उसे भान ही नहीं रहा की वो  ग़लत जगह पहुँच गई है , आँखे सूज गई थी , चेहरे की थकन उसके
हालात का पता दे रही थी । शरीर में हिम्मत शेष कहा थी जिस घर में वो पढ़ी- बड़ी  वो घर उसका था ही नहीं वरना माता - पिता के रहते  पास के पेड़ के सहारे बैठे बैठे कब सो गई ,उसे पता नहीं चला जब नींद खुली तो उसके पैर के पास सिक्के पड़े थे लोगो ने भिखारी समझ कर फेके शैलजा की आँखों में आँसू भर आये , उसने सिक्के बटोरने शुरू कर दिए ,वो भिखारी ना थी पर उसकी आँते कुलबुला रही थी , मायके में होती तो ,रोज़ उसके खाने के नखरों से माँ परेशान हो जाती थी , पर आज भूख लगने पर वो सूखी रोटी खा ने  को तैयार थी,पास में रुपये थे कहाँ सो वो पैसे उठा कर जाने ही वाली थी कि गली में   लगे बल्ब ने उसकी चुग़गए ली कर दी , पैसे उठाते हुये कुछ शराबियो ने उसे देख लिया , हिरन आज भड़ियो की गिरफ़्त में था ,  बेसुध हो उसने फिर भागना शुरू किया,पर पीछे एक नहीं छह - सात लोग पीछे पड़ गए ,हाथ पैर ढ़ीले पड़ गए थे ,पूरे शरीर में सिहरन दौड़ रही थी ,उसकी आँखों से पानी छलकता जा रहा था पता नहीं कहाँ से आवाज़ आई "कौन  कौन है वहाँ ?  शैलजा ने देखा वो प्रशांत था उसका बचपन का दोस्त बदहवासी में जो संकट के समय सहारा दिखा उसी कि तरफ दौड़ी और फूट -फूट कर रो पड़ी ,प्रशांत कभी सोच भी नहीं सकता था कि शैलजा उसे इन हालात में मिलेगी ,प्रशांत कि आवाज़ सुन कर आस -पास के लोग अपने -अपने घरों से निकल कर आ गए। भले ही किसी ने कुछ ना किया हो,
पर अकेले जान कर पीछे पड़ने वाले लोग , भीड़ को इकठ्ठे देख कर सबसे जल्दी भाग गए।

होनी -अनहोनी को कोई नहीं जानता , पर ये संजोग ही था कि उस दिन प्रशांत मीना के घर ही ना आता तो ना जाने शैलजा का क्या हो गया होता। अनगिनत सवाल सब के मन में थे , शैलजा ऐसे हॉस्पिटल से भागी क्यों ?
मायके क्यू नहीं गई ? मीना भी शैलजा के इस तरह आने से सहमत नहीं थी ,पर उस वक़्त शैलजा ने इतना ही कहा , सड़क पर बैठ कर भीख भीहुई सकती हूँ पर ,ससुराल में दहेज़ कि बलि- वेदी पर नहीं चढूँगी। मीना कुछ देर तक चुप -चाप रही ,मीना अकेली रहती थी, ज़िंदगी को करीब से देख चुकी थी ,  विवाह केवल उसके जीने का लक्ष्य नहीं था इसलिए कुछ सोच कर उसने शैलजा को ढाँढस बंधाया  "थोड़े दिन आराम करों , सब ठीक हो जायेगा"   हताश हो चुकी शैलजा जैसे मन ही मन रो उठी, ठीक ही तो है लड़कियों का घर कहीं होता ही नहीं 25 साल जिसे घर मान कर हर रिश्ते को जीवन देती है , एक दिन वहीं घर पल में छूट जाता है , जहाँ अपनाई जाती है , वहाँ कितने दिन कैसे रहना पड़े पर हर घड़ी अहसास बना रहता है कि पराए  घर से आई है क्या जानेगी ?
मीना ने शैलजा को अपने कपड़े दिए।  उस रात शैलजा सो गई पर मीना नहीं सो पाई ,मानों उसने पूरी रूप -रेखा
तैयार कर ली हो , F  I . R  दर्ज़ हुई , पर आगे संधर्ष करना था ,मीना जानती थी कि शैलजा के माता -पिता  उसे
घर में तो उसे रख लगे , पर शायद समाज के आगे सर झुका कर रह जायेगे।

शैलजा के लिए मीना का मिलना वैसा ही था जैसे भक्त को , भगवान मिल गये हो।   मीना ने उसकी
बातों पर विश्वास किया , विश्वास से ही  विश्वास बनता है  , कुछ महीनों बाद  मीना ने शैलजा के पति   परनए कार्यवाही कर दी , N.G. O में वकील होने का कुछ तो फायेदा हो कह कर वो हँस पड़ी साथ ही शैलजा भी महीनो बाद मुस्कुरा दी ,आज वो मीना के साथ काम करेगी शायद अपने जैसे लोगों के लिए कुछ कर पाए , डाल से टूटे पत्ते को ठौर मिल गया था ।उस दिन किसी कि लडक़ी विवाह वेदी पर जलने से बच गई थी। शैलजा ने एक और कदम उठाया था , मीना कि तरह सामाजिक कुरीतियों से लड़ने का ,प्रशांत इन सब में मौन हो चला था , क्योंकि वक़्त और हालात बड़ी तेज़ बदलते है इसके बाद शैलजा अपने माता -पिता के पास गई कि नहीं कोई नहीं बता सका , कुछ बातें वक़्त के साथ ही पता चलती है।
उसका दुःख लाखो स्त्रियों का दुःख होगा यही सोच कर वो  मीना के साथ कदम मिला के चल पड़ी । एक नए सवेरे के लिए..... उम्मींद और विश्वास के साथ।
लेखिका - आराधना राय "अरु" 


                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     
Post a Comment

Popular posts from this blog

नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का
आराधना राय

नज्म

उम्र भर के निशा ढूंढते है
ऐ - सहर हम तुझे ढूंढते है तू सितारा है आसमा का 
दर -ब -डर हम तुझे ढूंढते है तू है सागर में भी हु नदिया
तेरे कदमो में पनाह ढूंढते है राते कितनी भी हो गई काली
एक उजाले को हम ढूंढते है ---------------अरु