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ग़ज़ल ---------



साभार गुगल





   इश्क में किसने कैसा सवाल रखा है
   सिर्फ मजबूरियों को उछाल रखा है

    तुझे पा कर भूल जाना नसीब गर है
     ज़ख़्म खा कर दिल को बहाल रखा है
   
    उसकी रुसवाई मेरी रुसवाई बनी है
   यही कह कर खुद को संभाल रखा है

   बीते लम्हों को दिल से लगा रखा है
   पूछ हमने कैसे तिरा ख्याल रखा है

   रकीब ने घर का रास्ता देख रखा है
 "अरु"  परेशनियों को हमने मोल रखा है
    आराधना राय "अरु"
   मोल--- खरीद
  रकीब ---- दुश्मन
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला