Skip to main content

भूल गए



उन को अपना किस्सा -ए-गम भी सुनाना भूल गए
उन के पहलू से उठे और आसूँ बहाना भूल गए

राज़ और रंजिश के बादल छंट गए सारे तभी 
बात हमने इक कही मतलब बताना भूल गए

चैन से नींद आ जाएगी हमतो यही सोचा किये
दिल से तुम्हारी याद को हम ही मिटाना भूल गए

उनकी ये दीवानगी मेरी ही नज़रों में "अरु"
याद उस मोहसिन की इस दिल से भूलाना भूल गए

 आरधना राय "अरु"
Post a Comment

Popular posts from this blog

नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




नज्म

नज्म
हाल उनको भी पता है जमाने का नही यह काम उनको कुछ बताने का
खुद ही तोड़ दी अपनी हमने अना यह खेल नहीं सनम उनको मनाने का
कभी तो लब पे मेरा नाम लेते वो हमें काम नहीं कुछ उन को जताने का
मेरे इकरार पर उनका इसरार होगा जब तभी तो बात बनेगी रिश्ता निभाने का
आराधना राय

नज्म

उम्र भर के निशा ढूंढते है
ऐ - सहर हम तुझे ढूंढते है तू सितारा है आसमा का 
दर -ब -डर हम तुझे ढूंढते है तू है सागर में भी हु नदिया
तेरे कदमो में पनाह ढूंढते है राते कितनी भी हो गई काली
एक उजाले को हम ढूंढते है ---------------अरु