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शहर की बात



शहर की बात
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अब किस शहर की बात हो 
जहाँ सुबह सी कोई रात हो

हर शख़्स ही जहाँ खास हो
अवाम की जहाँ पे बात हो

 ना भूख रोटी को  ढूँढती हो
 कफन ज़िंदगी ना ओढ़ी हो

यूँ इक सरज़मी की बात हो
उजालों पर यूँ ना सवाल हो

जहॉ रोशन हर ज़हन यूँ हो
हर बात पे ना कोई बवाल हो

कोई ख़्वाब हसीन नसीब हो
"अरु" मंज़िले कुछ करीब हो

आराधना राय "अरु"
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कफन -श्राउड, मृत्यु का सामान
सरज़मी- क्षेत्र, देश
अवाम- जनता , पब्लिक
शख़्स- आदमी ,,इंसान
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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है
देख कर आए है दुनियाँ सारी
ना वो दर रहा ना वो घर रहा
आँधियों  का डर नहीं था धरोंदे को
मेरा दिल ही हादसों के नज़र रहा
तोड़ दी कमर मेरी गरीबी ने
मै जहां रहा  बे शज़र रहा
आ गए याद मुझे चहरे पुराने
उन्ही के नगर बे डगर रहा
अरु