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आराधना * बाबा नागा अर्जुन और कबीर जी के जन्म विशेष पर

आराधना *  बाबा नागा अर्जुन और कबीर जी के जन्म विशेष पर 
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नमन करुँ उस प्रवीण आत्मा को

उससे उपजी गहरी सी साधना को

दे रहे  कबीर भी अपनी ओज वाणी

नागार्जुन जगा  रहे थे समाज वाणी

समाज रहेगा सदा ही अनुग्रह ऋणी 

हिंदी भाषा ने पाई थी  समृद्धि धनी 

सूर्ये  भी यहाँ झुके नतमस्तस्क हो 

कर्म पथ के वीर बात करते गंभीर 
आराधना

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नज़्म

अब मेरे दिल को तेरे किस्से नहीं भाते  कहते है लौट कर गुज़रे जमाने नहीं आते 
इक ठहरा हुआ समंदर है तेरी आँखों में  छलक कर उसमे से आबसर नहीं आते 
दिल ने जाने कब का धडकना छोड़ दिया है  रात में तेरे हुस्न के अब सपने नहीं आते 
कुछ नामो के बीच कट गई मेरी दुनियाँ  अपना हक़ भी अब हम लेने नहीं जाते 
आराधना राय 




कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला