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किसकी पुकार है

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साभार गुगल इमेज़

इस गंदले उथले पानी में कुछ भी साफ़ नहीं है
ठहरे पानी में किसकी परछाई नज़र आती है

खुद को भी पहचानना भी तो  अब सरल नहीं है
देख कर आत्मा भी यहाँ पर क्यों तड़पती नहीं है

किसकी पुकार है  आवाज़ बन के उभरती रही  है
कौन जाने वक्त ने यहाँ कैसी क्या चाल चली  है

जंग लगे कितने  दिलों में  वो कौन से अरमान है
जिन  के लिए चले जब राह ,में वो भी पास नहीं है

रास्ते ही रास्ते है मंज़िल का भी अब पता नहीं है
इससे आगे मेरे लिए भी क्या कहे जगह  नहीं  है
आराधना





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महज़बीं

महज़बीं
अब हवाए भी तेरा हर घड़ी नाम लेती है 
कभी रातों को कोई ये नया पैग़ाम देती है 

तुझे ही सोचते ज़िंदगी तन्हां बसर हुई है
तुझे ही देखते यू ही उम्र सारी गुज़र रही है 

गर -चे तू फ़लक था मैं यू भी महज़बीं रही हूँ 
"अरु" यू भी सितारों से कोई तो राह गुज़री है 
आराधना राय "अरु" 



महज़बीं -उम्मींद कि किरण -Mehjabin is a bright ray of sunshine after a cloudy day.. 

फ़लक - आसमां , स्वर्ग ,संसार     Falak. Means universe- 
कैसे -कैसे दिन हमने काटे है 
अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है

पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है
आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है

इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है
तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है

दिल में तूफान छुपाये बैठे है 
बिन बोली सी जैसे बरसाते है

दो शेर

दो शेर

वो जिधर  निकला काम कर निकला
वो तीर था मेरे जिगर के पार निकला

मेरी खामोशियाँ भी बात मुझे  करती है
तेरी बेवफाईयों को मेरी नजर कर निकला