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नज़्म

तेरे जाने के बाद तुझसे गिला नहीं शिकवा,शिकायत आरज़ू ,बाकी नहीं पत्थर है दिल नहीं जिंदगी में जुस्तजू तेरे सिवा कोई नहीं आती बहारें लौट जाए तेरे हसीन मकान से ऐसा कब हो सका है किसी चारागार में जीने के लिए काफ़ी है मेरी टूटी सी झोपड़ी तेर फरेबी वादों से अच्छी है खरी बात नए मरहले अभी है इन मरहलों के बाद आराधना राय "अरु"

क्या देखते हो

क्या देखते हो ठहरे हुए पानी में क्या देखते हो गुज़रे वक्त की पेशानी पे क्या देखते हो छलक जाती है मेरी आँखे क्यों पोछते हो जुल्म कर जाते हो हर बार मुझ पे चोट को आकर क्या कभी देखते हो दर्द पूछा होता ठहर जाने का मुझ से खो चुकी दरिया की रवानी क्या देखते हो हँस रहा था सारा ही जहान मुझ पर मेरी लाचारी को क्यों तूम देखते हो हँस तो दिए तुम मेरे छाले देख कर आँखों के मेरे जाले देख कर किसलिए कुफ्र रोज़ ढाते हो तुम मंदिर ,  मस्जिद हर रोज़ गिरते हो तुम आराधना राय "अरु"

देखिये

मेरे पहलू में भी आ कर देखिए दिल से दिल मिलाकर देखिए मेरे हमदम की गाई ग़ज़ल साथ मेरे गुनगुनाकर देखिए नफरतों कि बस्तीयों को भूल कर प्यार कि दुनियाँ बसा कर देखिए मुश्किलों में तो थपेड़े धुप के साथ मेरे भी खा कर देखिए आप के कन्धे पे रखा है सर प्यार से थपथपा कर देखिए लाए है तोहफ़े में हम जां और ज़िगर आप नजरें उठा कर देखिए ग़र खता कोई नहीं कि आपने आँखों से आँखों मिला कर देखिए चाँद तारों से भला क्या पूछना "अरु" खुद ही आकर देखिए आराधना राय "अरु"

दोस्तो देख लो

करम कैसा ये उल्फतो का अजब है दोस्तो देख लो पड़े हैं  उनकी  रहमतो पर गज़ब  दोस्तो देख लो खतावार  हुआ खुद  गम का  शिकार रास्ता देख लो रहम यहाँ किस के दिल के करीब  दोस्तों देख लो कड़ी दरवाजे की बंद कर के दुनियाँ  से वास्ता देख लो आँख बंद कर के सहरा -ओं के सराब  दोस्तों देख लो बड़े अदब का क़ायदा रिवायत उनकी कायदा देख लो हर इक पल  तराशा उन का हिसाब  दोस्तों देख लो आराधना राय "अरु"
अधुरा गीत -------------------- गीत अधुरा रह गया मौन अनकहा रह गया प्रीत की बतिया  कही मन  तृष्णा  कह गया बसंत रीता  रह  गया हर रंग फीका रह गया साँझ विरहन भाई नहीं मौसम अधुरा रह गया साँझ की बेला का दीया सिसकता हुआ रह गया चूड़ियाँ टूटी सुहाग की हिय का गहना खो गया सरहद पे सिंदूर पुछ गया देश के नाम पीया तू गया आँसुओं से स्वपन लिखा पीड़ा में उमड़ के कह गया धरोहर रख कर कैसी गया आँखों में आँसू  छोड़ गया अपनी यादों की निशानी सूनी कलाई में देकर गया देश मेरा वीरान  हो गया बेटी का दर्द बेगाना  गया  रिश्तों को तिलांजलि में मोल-भाव में  व्यर्थ गया दुल्हन की लाज ले  गया डोली क्या अर्थी सजा गया  सोता रहा चादर ओढ़ कर बेटी का अपहरण हो गया वेदना का मुँख खुल गया जीवन,मृत्यु के नाम गया तरस अन्नदाता अन्न को प्राणों का मोह ही रह गया काज़ल आँखों का बिध गया हदय पे आघात कर के गया मूक हो पथ पर तूम बैठे हो  जिव्हा से मानों  स्वर गया  दुःख में मुस्कान बिखरा गया अंधकार की ज्योति  हो गया...

तुम्हारा

ग़ज़ल ------------------------------------------------------------------------------------------------- बे वजह नाम तो मेरा न पुकारा होगा आपके प्यार का ये एक इशारा होगा जख्म को मेरे इक तेरा सहारा होगा अभी भरा है  कभी तो ये  हरा होगा  दर्द सीने मे उसके भी उठता होगा   चाँद तन्हा है इक दिन हमारा होगा  कच्ची मिट्टी के घर मे  गुजारा होगा  शहर का तुनक मिज़ाज़ ना प्यारा होगा .   इन अंधेरों का कोई  तो उजाला होगा   दर्द सीने का भला किसको गवारा होगा   माँ का दिल भी दर्द से तड़पा होगा अरु ,   चोट खा कर जब अश्क उमड़ता होगा आराधना राय "अरु"

कहे क्या

कहे क्या वो आज़माने आये है खुद का जी बहलाने आये है कहाँ से रंज इतना संग लाये है बिन पिये ही वो लडखडाये है किसी सोच से वो टकरा आये है इक मुद्दत के बाद वो मुस्कुराये है खुदी का सौदा जब कर आए है कहे क्या किस बात पर पछताये है वक़्त की  चाल  देख आए है आईने से आज क्यों वो घबराये है बड़े नाज़ से वो  समझाने आए  है लगा जैसे वो हमारे "अरु "हमसाये है आराधना राय "अरु"

दिल ने पाया है

गीत --------------------------- दर्द दिल ने पाया है जीने का सहारा है ढल चुके नगमों में हाले- गम हमारा है दर्द दिल ने----------------- वक्त ये हँसी कब है जो मोड़ पे पुकारा है आए ना खबर कुछ भी किसे साथ ये गवार है दर्द दिल ने----------------------- जिंदगी इक दरिया है वक़्त में हम धारा है संग-संग ही चलना है क्या अजब इशारा है दर्द दिल................. आराधना राय "अरु"

ग़ज़ल मंच की बात

30 जनवरी 2016 इस मुबारक दिन को प्रतिभा -मंच की  कामयाबी का जश्न कहा जाए तो ठीक ही होगा । गुलदस्ता -ए -ग़ज़ल , प्रतिभा मंच का यह पहला काव्य साँझा काव्य संग्रह है। यह अपनी तरह का पहला संकलन है,गौर करने की बात है , इसमें उर्दू की सभी गज़ल - हिंदी कविता देवनागरी लिपि में है।  अपने आप में अनमोल खास -और आम अवाम ( जनता )  की बात कहती ग़ज़ल वतन- परस्त शायर असद निज़ामी साहब के संपादन में 84 कलमकारों की आवाज़ है।  "उर्दू को हिंदी की जुबां से सुनिए" की आवाज़ को तीन महीने पहले असद निज़ामी साहब ने बुलंद हो कर एक  हिंदी को उर्दू अदब के साथ जोड़ कर वह्ट्स एप पर ग्रुप बनाया जो करीब एक हफ्ते में फेसबुक पर प्रतिभा-मंच के नाम से पहले दिन एक घंटे में 1500  लोगों से जुड़ गया । आज इस में करीब 16000 लोग हैजो अपनी मर्ज़ी से जुड़े है। सीधी -साधी जुबां में कहूँ तो हिंदी और उर्दू के माँ- और मौसी के रिश्ते की तरह, गैर मुस्लिम- और मुस्लिम दोनो एक छत के नीचे ज़मा है। जो आज की तारीख में हिंदू -मुस्लिम एकता की बात कहते है ।  प्रतिभा-मंच में खासा इंतजाम  किया गया ग़ज़ल सीखने ...

फासले हुए है

साभार गुगल मेरे नाम दिन के उजाले हुए है अंधेरों को हम क्यों पाले हुए है किन मज़बूरियों में ढाले हुए है हालत तंग दिल में छाले हुए है ख्वाब क्यों हमने पाले हुए है हसरतों कि ख्वाहिशें वाले हुए है बिना बात दिल में जाले हुए है किन महफिलों के हवालें हुए है लगी बात दिल पे मतवाले हुए है इंसानों में अजब "अरु" फासले हुए है आराधना राय "अरु"   ©

नजाब शाहिद मिर्ज़ा "शाहिद" के मिसरे के ऊपर कही गई ग़ज़ल

तिभा-मंच की ओर से नजाब शाहिद मिर्ज़ा "शाहिद" के मिसरे के ऊपर कही गई ग़ज़ल---आर काफिया -रदीफ किसलिए फिलबदी -110 से हासिल आश्यार अर्ज़ है मतला - लोगों की नज़र में बने खार किसलिए चलती है बात-बात में तलवार किसलिए ----------------------------------------------------------------------- मतला -2 रातों को जागते रहे नाउम्मीदी किसलिए सहते रहे है दर्द हुए बीमार किसलिए ------------------------------------------------------------------------------------------------- जुबां से तीर -ओ- खंज़र चलाए हज़ार बार खामोश हो गए है तलबगार किसलिए ----------------------------------------------------------------------------------------------- ज़ख़्म मिले है लोगों से जहां में बार बार नासूर बन बहे है हरबार किसलिए ------------------------------------------------------------------------------------------------- नुमाईश सी बाज़ारों में सजती है लडकियाँ गुरबत के हाथ रोज़ तिरस्कार किसलिए ---------------------------------------------------------------------------------------------- बन गया बाज़ार रातों -रात मेरा तमाम देश इ...

मेरी सांसों में

मेरी सांसों में कविता ------------------------------------ तुम बसें हो मेरी सांसों में  मेरी धड़कन में तुम समाते हो  मैं थरथरा रही हूँ लों की तरह तुम मेरे साथ -साथ जलते हो गुम रह कर देख ली दुनियाँ तुम अपनी साँस से महकते हो तेरे संग रह कर पा लिया है तुझे तुम मेरे रोम- रोम में बसते हो मेरी नज़रों में धुंध सी रहती है तुम किसी धूप सा मुस्कुराते हो तेरे कदमों में ज़माना पड़ा "अरु"तुम साया बन कर आते हो आराधना राय "अरु"

तराना बहार का

चिडियों ने गाया तराना बहार का रस्मों- रिवाज़ छोड़ कर सब्र-ओ-करार का उसकी नादानियां भी कबूल हो गई वादा निभाया जिसने अपने हज़ूर का दोस्तों ने अपनी सब आदत बदल  ली करना ना छोड़ा ज़िक्र मेरे शहर का मालूम क्या रास्तों वो ही  मिले मुझे साथ देता रहा कोई मेरी राहगुज़र का ढूंढने से कोई इंसान  दिखाई नहीं दिया देख लिया हाल  हमने अपने भी शहर का सूरज ने उग कर फलसफा यही दिया मुदद्त के बाद देखा "अरु" घर हमने सहर का आराधना राय "अरु"

तो क्या होता

रदीफ- तो क्या होता- काफिया होता, क्वाफी-पता , अता,रहता आता खता -------------------------------------------------- इश्क ना होता बता तो क्या होता खुदा सामने होता तो क्या होता उनकी नज़रों से गिरा तो क्या होगा संभल कर चलना आता तो क्या होगा उसका जीना मरना मेरे संग होता बन कर मुरीद रहता तो क्या होता बंदगी उसकी तिजारत ना होती होता वफ़ा का पता तो क्या होता निगाहों का गिरना उठाना ना होता उसका करम होता अता तो क्या होता उस की अंजुमन से उठ जाते क्या होता सह जाते "अरु" खता"तो क्या होता ©  आराधना राय "अरु"

दुश्वारी

जिंदगी के नाम लिख कर दुश्वारी नेता अपनी चाल -चल कर आए नून, तेल, लकड़ी हाय मंहगाई आप अपना जनाज़ा ले कर आए इक फज़ीहत भला किस को नहीं भाए गाँव के खेत बेच कर नया मकान ले आए राहत के नाम राहत सोच कर पछताए कहाँ से ढूढ़ कर इत्मिनान के पल ले आए सिल-सिला कौन सा मुझ को तुझ से जोड़ जाए रहन पे सामान बाज़ार से सब उधार लाए कौन सारी रात जलता अंधेरों में इक दिया अपनी किस्मत का अँधेरा "अरु"  खुद ले आए   © आराधना राय "अरु"

तमाशा हो गया

सौदा खुद बाज़ार में ये कैसा हो गया  तमाशाई खुद यहाँ पर तमाशा हो गया  कौन सा दिन कहर का नाज़िल हो गया  लोगों की दुश्वारी से कोई परेशां हो गया  दिल के जाने पर हादसा साथ हो गया  साहिल पे कश्तियाँ डुबों शर्मिंदा हो गया बयाँ कर सका ना कोई तकदीर हो गया जिंदगी तेरे हाथों कोई निराश हो गया सौ- मुश्किलें पड़ी दिल तार- तार हो गया बस्ती के लोगों के लिए  कहकशां सा हो गया अहसान फरामोश ही जब कारवां हो गया फ़कीरी में रहना भी "अरु" इक नशा हो गया ©   आराधना राय "अरु"

जान

जान नहीं जब पूरा नाता विभेद ह्रदय में उपज जाता ज्ञान नहीं कोई पूर्ण पाता बीच राह में भ्रमित हो जाता अधकचरी सी बात सुनाता असत्य सत्य नहीं बन पाता   © आराधना राय "अरु"

सुंदर-रूप तुम्हारा

सुंदर- सुमधुर रूप तुम्हारा सागर जल ममता से हारा देव आरती क्या मैं कहलाऊँ सहज सुधा जीवन तुम्हारा भेद नहीं कहो क्या मैंने जाना तुमने राम संग जीवन पहचाना अतुलित परम ही धर्म तुम्हारा संग- साथ ना रहा कभी हमारा गर्भरत्न मात्र इक रहा सहारा क्यों ना दिया तुमने साथ हमारा आराधना राय "अरु"
कविता तब की जब "अना"नाम से लिखा पर "अना कासिमी से परिचय के बाद जाना की वो भी "अना है तब से मैं "अरु " नाम से लिख रही हूँ पैमाने और पैमानों के ऊपर कसी गई जूनून -ए जंग ऐसा की मौत से लड़ गई कांच के महलों में ,ये दीवानगी हो गई मेरी कहानी हर दरीचे को पता हो गई मैं रूह थी मेरा ना कोई मक़ाम रहा ज़र्रे ज़र्रे , बिखरी और निखर गई देर से जाना, अपने हिज़र का अंजाम सुबह होने तक मैं अपनी ज़बा खुद हो गई क्या कहे "अना" अपनी हम तुमसे खुद रोई मेरी दास्ता और फना हो गई आराधना राय "अरु" Tulika ग़ज़ल ,गीत ,नग्मे ,किस्से कहानियों का संसार