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तुम्हारा


ग़ज़ल
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बे वजह नाम तो मेरा न पुकारा होगा
आपके प्यार का ये एक इशारा होगा

जख्म को मेरे इक तेरा सहारा होगा
अभी भरा है  कभी तो ये  हरा होगा

 दर्द सीने मे उसके भी उठता होगा
  चाँद तन्हा है इक दिन हमारा होगा

 कच्ची मिट्टी के घर मे  गुजारा होगा
 शहर का तुनक मिज़ाज़ ना प्यारा होगा
.
  इन अंधेरों का कोई  तो उजाला होगा
  दर्द सीने का भला किसको गवारा होगा

  माँ का दिल भी दर्द से तड़पा होगा अरु ,
  चोट खा कर जब अश्क उमड़ता होगा

आराधना राय "अरु"


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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"