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तराना बहार का

चिडियों ने गाया तराना बहार का
रस्मों- रिवाज़ छोड़ कर सब्र-ओ-करार का

उसकी नादानियां भी कबूल हो गई
वादा निभाया जिसने अपने हज़ूर का

दोस्तों ने अपनी सब आदत बदल  ली
करना ना छोड़ा ज़िक्र मेरे शहर का

मालूम क्या रास्तों वो ही  मिले मुझे
साथ देता रहा कोई मेरी राहगुज़र का

ढूंढने से कोई इंसान  दिखाई नहीं दिया
देख लिया हाल  हमने अपने भी शहर का

सूरज ने उग कर फलसफा यही दिया
मुदद्त के बाद देखा "अरु" घर हमने सहर का

आराधना राय "अरु"

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))