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कहे क्या

कहे क्या वो आज़माने आये है
खुद का जी बहलाने आये है
कहाँ से रंज इतना संग लाये है
बिन पिये ही वो लडखडाये है
किसी सोच से वो टकरा आये है
इक मुद्दत के बाद वो मुस्कुराये है
खुदी का सौदा जब कर आए है
कहे क्या किस बात पर पछताये है
वक़्त की  चाल  देख आए है
आईने से आज क्यों वो घबराये है
बड़े नाज़ से वो  समझाने आए  है
लगा जैसे वो हमारे "अरु "हमसाये है
आराधना राय "अरु"

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))