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बारात चली थी

बारात चली थी
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वो हाथों कि मेंहदी दिखाते है
हमारे दिल को क्यू खूँ में नहलाते है
उसकी आंखों में सिर्फ लाली थी
वो किसी और कि हमेशा जो होने वाली थी
सब ने लाल जोड़ें में सजे देखा
उस के दिल के दर्द को किसी ने ना देखा था
तमाम खुशियों कि बारात सजी थी
बड़ी ख़ामोशी से इश्क़ कि अर्थी सजी थी
बडी धूम से डोली उठी थी
किसे पता "अरु " लाचारी लेकर चली थी
कोई युग हो उस में गरीब की बेटी जली
अग्नि-परीक्षा बारम्बार सिया की हुई थी
सोते हुए भारत को कैसे कोई जगाए
रण से लौट कर जो सिपाही ना कभी आए
हजारों सदियों को अपने में लपेटे
नारी क्यों तेरा आँचल हमेशा ही कोई खी
दहेज़ की आंधियाँ घर हर किसी का लुटे
इन्हीं नाकामियोंसे मेरा देश जूझे
आराधना राय "अरु"

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श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"