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क्या देखते हो

क्या देखते हो
ठहरे हुए पानी में क्या देखते हो
गुज़रे वक्त की पेशानी पे क्या देखते हो
छलक जाती है मेरी आँखे क्यों पोछते हो
जुल्म कर जाते हो हर बार मुझ पे
चोट को आकर क्या कभी देखते हो
दर्द पूछा होता ठहर जाने का मुझ से
खो चुकी दरिया की रवानी क्या देखते हो
हँस रहा था सारा ही जहान मुझ पर
मेरी लाचारी को क्यों तूम देखते हो
हँस तो दिए तुम मेरे छाले देख कर
आँखों के मेरे जाले देख कर
किसलिए कुफ्र रोज़ ढाते हो तुम
मंदिर ,  मस्जिद हर रोज़ गिरते हो तुम
आराधना राय "अरु"

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"