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जाती बहार में

मौसम के रंग -राग गए जाती बहार में फूलों के लब से बोल गए जाती बहार में गुम हो गए सभी जैसे सर्द रात के में ठंडक बनी रही दिलों में जाती बहार में सोए हुए थे पेड़ सभी जगाने के बाद जैसे कफस में सो गए कही जाती बहार में उम्मीद अपनी अपनी थी सर्दी के देश में कैसे कहे कौन रो कर ना उठे जाती बहार  में नादाँ है कुछ ना बोलिए मौसम नहीं सही "अरु" कातिल है अजब साथ जाती बहार में आराधना राय "अरु"

तहरीर देखती हूँ

   साभार गुगल तहरीर देखती हूँ --------------------------------------------------   कागज़ की जुबानी से तहरीर देखती हूँ   दिल में छुपी तेरी हर तस्वीर देखती हूँ    कागज़ नहीं कोरे हर हर्फ तोलती हूँ   वक़्त की किताबों में तहरीर देखती हूँ  एहसास लिए खुद के गम को झेलती हूँ  काँटों में उलझी सी जंजीर देखती हूँ    बागों में गुलों के रंग - बेरंग देखती हूँ  लफ्जों की बयानी से  ज़मीर देखती हूँ ख्वाहिशों के जंगल में जुगनु को देखती हूँ तन्हा रूठी सी तकदीर को देखती हूँ मायुस नहीं दिल की तमन्ना  देखती हूँ आँखों से "अरु"दिल कि जागीर  देखती हूँ आराधना राय "अरु" आराधना राय "अरु"

कविता

कविता --------------------------------------------------------- दुनिया के बाजार में चंदन नहीं बेचा करती हूँ दीप से तुलसी वदनं किया करती हूँ तन की ओट में मन का व्यापार नहीं करती हूँ संबंधों को मन से जीया करती हूँ आँचल, रौली, मौली का खेल नहीं करती हूँ पूजा- अर्चना से नमन किया करती हूँ नारी की अस्मिता का मान किया करती हूँ अश्रु को पौंछ जीवन जीया करती हूँ नदियों की धारा अविकल बहा करती हूँ पत्थरों से निकल आगे राह लिया करती हूँ अरु" सहज नहीं जीवन जीना अरण्य सा जीवन में हर गीत नया जी कर हँसती हूँ आरधना राय "अरु"

मंज़र देखा

gugal ke sojany se मंज़र देखा  ------------------------------- --------------------------------------------------- बेबसी में आस का मंज़र देखा जगह धुँआ -धुँआ सा देखा आँख में आँसू सा देखा, हर शक्स सहमा हुआ सा देखा रात के गहरे सन्नाटे में , जहरीली हवा के साये को देखा सिहरता -कांपता सा मंज़र मौत कि आगेश में लिपटा देखा उमर कट गई अँधेरे में उन्हें इक रौशनी के लिए तरसते देखा तमाम उम्र कफस में रह कर बरहा हमने उजालो की ओर देखा दफ़न मिट्टी में दबी लाशों का अम्बार लगा कर बस तमाशा देखा जान पर खेल कर इंसान हर तरफ रोता हुआ पूरा -शहर ही देखा काँपती रूह थी "अरु" लाचारियों का सुबह तक अजब दौर भी देखा आराधना राय "अरु"

माँ

माँ --------------------------------- सब को निवाला खिला कर आप भूखी रह पानी पी कर  ज़िन्दगी टुकड़ों में बिताती है रोते बच्चों के लिए हँस जाती है यौवन अपना होम कर जाती है रोटी कमाने में पीसी जाती है साड़ी की गाँठ में बंध जी जाती है संतान मुख देख सात- फेरों का दर्द झेल बिखर संवर जाती है सर्द रातों में कांपते बच्चों का संबल बन कर जीवन दे जाती है अमीर हो गरीब माँ - कहलाती है "अरु" संतान के लिए जगत में जीवन का जहर हँस के पी जाती है आराधना राय "अरु"

बारात चली थी

बारात चली थी ----------------------------------------- वो हाथों कि मेंहदी दिखाते है हमारे दिल को क्यू खूँ में नहलाते है उसकी आंखों में सिर्फ लाली थी वो किसी और कि हमेशा जो होने वाली थी सब ने लाल जोड़ें में सजे देखा उस के दिल के दर्द को किसी ने ना देखा था तमाम खुशियों कि बारात सजी थी बड़ी ख़ामोशी से इश्क़ कि अर्थी सजी थी बडी धूम से डोली उठी थी किसे पता "अरु " लाचारी लेकर चली थी कोई युग हो उस में गरीब की बेटी जली अग्नि-परीक्षा बारम्बार सिया की हुई थी सोते हुए भारत को कैसे कोई जगाए रण से लौट कर जो सिपाही ना कभी आए हजारों सदियों को अपने में लपेटे नारी क्यों तेरा आँचल हमेशा ही कोई खी दहेज़ की आंधियाँ घर हर किसी का लुटे इन्हीं नाकामियोंसे मेरा देश जूझे आराधना राय "अरु"

आवाज़

लिखती तो कविता ही हूँ , आज अपनी ग़ज़लनुमा कविता की बात करती हूँ। आवाज़ -------------------------------------------- उन के दरों -दीवार की बातें करें दिल से दिल मिलाने की बातें करें --------------------------------------------- कल तलक रहे बिल्कुल बे- आवाज़ आज उन के दीदार की बातें करें --------------------------------------------------- ज़मी चुप है,आसमां बड़ा खामोश सख्त होते हालात की बातें करें ------------------------------------------------------ मातम का होता है बस इक बहाना शब-ए -गम में क्या मौंत की बातें करें ------------------------------------------------------- हर एक कोई होता नहीं है मेहरबान बेरहम दुनियाँ की क्या बातें करें -------------------------------------------------------- दुख से मिलकर दुख का बादल छँटता माँ के आँचल के सकूँ की बातें करें -------------------------------------------------------------- भूख से ऊंचा रहेगा सदा ही ईमान बेबसी, भूख की क्या बातें करें ------------------------------------------------------------------ हम भी है कायल तेरे ए आसमान अरु देश के बदहालात की क्या ब...

शहर होने लगे

शहर होने लगे ----------------------------------------- नीम की छाँव तले दिया तुलसी का जले सूर्ये भी थककर रुके स्वर्णिम साँझ ढले पाखी का गुंजन उत्सव सा लगने लगे ह्दय का स्पंदन वीणा कि झंकार लगे स्वप्न सात रंगों के झिलमिल करने लगे मुधु- कि मुस्कान से जब फूल झरने लगे गाँव - मेरे शहर में आकर जब मिलने लगे दूर- दूर के पाखी मेरे शहर में मिलने लगे मेरा देश जब गाँव से शहर शहर होने लगे खेत- खलिहान गाँव के वियावान होने लगे आराधना राय "अरु"

माँ

माँ --------------------------------------------------- ज़िन्दगी तुझ से बिछडी कब मिली रात के बाद सहर -सहर सी ही मिली जीने के लिए उम्मींद- ए- जहां मिली तेरे इंतज़ार में रात नम उदास मिली आप से हौसला अजब पा रोशनी मिली हमने खुद को ही आज़माया बेखुदी मिली ज़िन्दगी से अज़ब जागीर ईमान बन मिली नींद जब भी मिली हमें पत्थरों पे ही मिली तुझ से बिछड़ कर माँ क्या ज़िन्दगी मिली ज़न्नत सी ख्वाहिशे तुझ से हज़ार मिली रात में सिलती रही मेरा लिबास उम्मीद मिली हर ख़ुशी बेलोस सी माँ तुझ से हर घड़ी मिली आराधना राय "अरु"

अजब- हाल

अजब- हाल ---------------------------------------------- सब कुछ बाज़ार में नीलाम हो गया है आदमी -आदमी से बेज़ार हो गया है कहें कौन किस लिए आए यहाँ पर आदमी अब खुद मुख़्तार हो गया है इंसानियत का अजब हाल हो गया है पते है आदमी गुमनाम हो गया है अंधेरों के नाम इक पैगाम हो गया है खरीदों -फरोख्त लगे सारी बेईमानी सी रौशनी की नहीं बात अंधेरों की बोलिए अब किस का किस से सरोकार रह गया है इंसान की इंसानियत का बुरा हाल हो गया है आराधना राय "अरु"

यूँ ही

उम्मीदों के उज़ाले में वो हर दिन मिलता है बड़ी देर तक वो यूँ ही तेरे चेहरे को तकता है -------------------------------------------------------- बात करती है निगाहें  भी तुम्हारी जब तेरी तस्वीर ख़ामोश होती  है खुद को भूल जाऊँ  मुमकिन ये है अब तुझ को भूलाना  मुश्किल है तेरी वफाओं का सिला क्या दूँगी ख़्वाब  टूटने का सिला क्या दूँगी तुम ख़ुदा से चले आये ज़िंदगी में मेरी तेरे सज़दे खड़ी  हुँ अब भला क्या दूँगी हज़ारों चराग ये  जल उठे महफ़िल में तेरी तेरी कही हर बात क़यामत ढाती रही यूँ ही

तलबगार

       ताक़त-ए-बेदाद-ए-इंतिज़ार नहीं है        हम सा  कोई तेरा  तलबगार नहीं है           हयात-ए-दहर कि वफा पहले दिखाइए          दिल मेरा उन अब तलक बेज़ार नहीं है            क़त्ल का उसने मेरे इंतज़ाम  ऐसा किया            वो जानता था दिल मेरा उस्तुवार नहीं है                      मेरा दिल दिल ना था क्यों बेदर्द सा हुआ               अब लोगों कि बातों पे मुझे एतबार नहीं है                माना के रोने पे  मेरा इख्तिआर नहीं है            अब उसको मेरा पहले सा इंतज़ार नहीं है              कहते है सितमगार मुझे लोग कुछ "अरु"                 उनके दिलों में अब बच...

ख़्वाहिशें

उन से मिलने की ख़्वाहिशें हज़ार की दिल ने मिल कर साज़िशें हज़ार की ना जाने कारवां किधर जा रहा था सबने आरइशे हज़ार की अपनी ही मस्ती में सब डूबे हुए थे बस्तियों में रिहाइशें हज़ार की साथी अजब से राह में मिल रहे थे सबने सिफारिशें हज़ार की सफर रास्तों के ना आसान होंगे कहने को "अरु" ख़्वाहिशें हज़ार की آرادنا رائے ار

ईद -

                             ईद ईद से खूबसूरत कहाँ कोई बात होती है ईद के चाँद में अक्सर कोई बात होती है रुखसत हुई हो डोली में दुल्हन ही आज इज़्ज़त से जो हो जाए वहीं बात होती है बारात सज रही है अर्श पे लगता है आज हिल - मिल कर ही दिल से बात होती है रब के होने का अहसास जगाता है  चाँद जब भी मिलती है रूहानी सी बात होती है उसी देख कर तारे की अजब रात होती है फलक पे चाँद की" अरु" नूरानी बात होती है आराधना राय "अरु"

आये है

भ्रम है उन्हें की वो खुदा बन कर आये है कर्म कर ना सके जो कर्मवीर बन आये है लगा के आग दामन में अब बचाने आये है सुना के राज़ दिल का  दिल लगाने आये है दुनियाँ -ए- दीन की खबर हमको देने आये है लूटा के आशियाँ दिल का अपना बनाने आये है देखती है आँखे ख़ामोशी से रात को जो ख़्वाब खुदा के नाम पे " अरु " को सताने फिर आये है आराधना राय "अरु"

भूल गए

उन को अपना किस्सा -ए-गम भी सुनाना भूल गए उन के पहलू से उठे और आसूँ बहाना भूल गए राज़ और रंजिश के बादल छंट गए सारे तभी   बात हमने इक कही मतलब बताना भूल गए चैन से नींद आ जाएगी हमतो यही सोचा किये दिल से तुम्हारी याद को हम ही मिटाना भूल गए उनकी ये दीवानगी मेरी ही नज़रों में "अरु" याद उस मोहसिन की इस दिल से भूलाना भूल गए   आरधना राय "अरु"

तंज़

तंज़ ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- वो कहते है बात करना छोड़ दो आपस में रिश्ता रखना छोड़ दो  ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- मंदिर में भगवान को पूज कर मस्जिद में कुरान पढ़ना छोड़ दो ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- तलवार मंदिर को करते हो भेंट मानवता का पाठ पढ़ना छोड़ दो --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- बातें अनर्गल करते है रहे वो खुद इंसान को इंसान कहना छोड़ दो ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- खा रहे जो नेता इंसानो को रोज़ वो कहते है मांस खाना छोड़ दो -----------------------------------------------------------------------------------------------...

छोटी सी बात

साभार गूगल दिल ही समझे दिल की बात। .....                                                      छोटी सी बात  (  लधु -कथा  ) ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- कोई बात नहीं हुई थी , फिर भी लग रहा था की कोई  शीत युद्धचल रहा है। कनक लगभग अपना सामान बाँध चुकी थी , उसने अनमने ढंग से सुकेश से पूछा " तुम्हारा सामान बांध दू या नहीं" । "नहीं " अख़बार एक तरफ फेक कर उसने दो टूक उत्तर दिया।  कनक को जैसे मालूम था , की सुकेश क्यों उस के मायके उस के साथ नहीं जा रहा बोलना बहुत कुछ चाहती थी मगर बोली नहीं, मन मसोस कर सामान लगाती रही। पता नहीं सुकेश को साथ न देख क्या बोले माँ बाबूजी , मन ही मन वो भयभीत होती रही।  बड़ी देर तक खुद ही अपने माँ बाबूजी की कल्पना कर प्रश्नों के  उत्तर देती रही। टिकट रखने से लेकर , घर का  बिखरा सामान लगाने त...

गिला न हुआ

ज़िन्दगी से कोई गिला न हुआ उससे मेरा सिल-सिला न हुआ  मेरा हमदम ,हमसफर न हुआ उससे मेरा सिल-सिला न हुआ मेरा हमदम ,हमसफर न हुआ उससे मिलना मेरा मिलना न हुआ हम रहे पास या तुझ से दूर " अरु" मुस्कुरा दे तेरे बिन हम से न हुआ आराधना राय "अरु"

कही दूर

रिश्ते कही दूर जब खो जाते है अनकही प्यास से बन जाते है धुप के पास एक ही है निशा साया हर दर का वो बन जाते है किसके आँसुओ में इतना सब है  देख कर उसको बूत से बन जाते है आराधना राय 'अरु'