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कविता

कविता
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दुनिया के बाजार में चंदन नहीं बेचा करती हूँ
दीप से तुलसी वदनं किया करती हूँ
तन की ओट में मन का व्यापार नहीं करती हूँ
संबंधों को मन से जीया करती हूँ
आँचल, रौली, मौली का खेल नहीं करती हूँ
पूजा- अर्चना से नमन किया करती हूँ
नारी की अस्मिता का मान किया करती हूँ
अश्रु को पौंछ जीवन जीया करती हूँ
नदियों की धारा अविकल बहा करती हूँ
पत्थरों से निकल आगे राह लिया करती हूँ
अरु" सहज नहीं जीवन जीना अरण्य सा
जीवन में हर गीत नया जी कर हँसती हूँ
आरधना राय "अरु"

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))