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माँ

माँ
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ज़िन्दगी तुझ से बिछडी कब मिली
रात के बाद सहर -सहर सी ही मिली
जीने के लिए उम्मींद- ए- जहां मिली
तेरे इंतज़ार में रात नम उदास मिली
आप से हौसला अजब पा रोशनी मिली
हमने खुद को ही आज़माया बेखुदी मिली
ज़िन्दगी से अज़ब जागीर ईमान बन मिली
नींद जब भी मिली हमें पत्थरों पे ही मिली
तुझ से बिछड़ कर माँ क्या ज़िन्दगी मिली
ज़न्नत सी ख्वाहिशे तुझ से हज़ार मिली
रात में सिलती रही मेरा लिबास उम्मीद मिली
हर ख़ुशी बेलोस सी माँ तुझ से हर घड़ी मिली
आराधना राय "अरु"

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))