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तलबगार




       ताक़त-ए-बेदाद-ए-इंतिज़ार नहीं है
       हम सा  कोई तेरा  तलबगार नहीं है

          हयात-ए-दहर कि वफा पहले दिखाइए
         दिल मेरा उन अब तलक बेज़ार नहीं है

           क़त्ल का उसने मेरे इंतज़ाम  ऐसा किया
           वो जानता था दिल मेरा उस्तुवार नहीं है
     
               मेरा दिल दिल ना था क्यों बेदर्द सा हुआ 
             अब लोगों कि बातों पे मुझे एतबार नहीं है
  
            माना के रोने पे  मेरा इख्तिआर नहीं है
           अब उसको मेरा पहले सा इंतज़ार नहीं है

             कहते है सितमगार मुझे लोग कुछ "अरु"
                उनके दिलों में अब बचा खूमार नहीं है

आराधना राय "अरु"
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इख्तिआर----- अधिकार
इंतज़ार--------- प्रतीक्षा
एतबार---------- विश्वास
उस्तुवार ------- कठोर, ताकतवर
बेज़ार--------- ऊबा हुआ, 
इंतज़ाम ------ जुटाना
ताक़त-ए-बेदाद-ए-इंतिज़ार ----- प्रतीक्षा रत रहने कि ताकत
हयात-ए-दहर -----------स्वर्ग सा जीवन

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"