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मंज़र देखा



gugal ke sojany se


मंज़र देखा 
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बेबसी में आस का मंज़र देखा जगह धुँआ -धुँआ सा देखा
आँख में आँसू सा देखा, हर शक्स सहमा हुआ सा देखा
रात के गहरे सन्नाटे में , जहरीली हवा के साये को देखा
सिहरता -कांपता सा मंज़र मौत कि आगेश में लिपटा देखा
उमर कट गई अँधेरे में उन्हें इक रौशनी के लिए तरसते देखा
तमाम उम्र कफस में रह कर बरहा हमने उजालो की ओर देखा
दफ़न मिट्टी में दबी लाशों का अम्बार लगा कर बस तमाशा देखा
जान पर खेल कर इंसान हर तरफ रोता हुआ पूरा -शहर ही देखा
काँपती रूह थी "अरु" लाचारियों का सुबह तक अजब दौर भी देखा
आराधना राय "अरु"


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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))