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आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना
गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना

हमने जाना नही तुमने माना नहीं
कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं

आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा
छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना

जब भी आना मेरे घर तूम ही आना
सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना

आराधना राय "अरु"

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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))