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यूँ ही

उम्मीदों के उज़ाले में वो हर दिन मिलता है
बड़ी देर तक वो यूँ ही तेरे चेहरे को तकता है
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बात करती है निगाहें  भी तुम्हारी
जब तेरी तस्वीर ख़ामोश होती  है

खुद को भूल जाऊँ  मुमकिन ये है
अब तुझ को भूलाना  मुश्किल है

तेरी वफाओं का सिला क्या दूँगी
ख़्वाब  टूटने का सिला क्या दूँगी

तुम ख़ुदा से चले आये ज़िंदगी में मेरी
तेरे सज़दे खड़ी  हुँ अब भला क्या दूँगी

हज़ारों चराग ये  जल उठे महफ़िल में तेरी
तेरी कही हर बात क़यामत ढाती रही यूँ ही






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कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))