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कुरुक्षेत्र

ईष्या द्वेष के मारों का हाल ना पूछे स्वार्थ हुआ मजहब कुछ हाल ना पूछे -------------------------------------------------- स्वार्थ से हुए अंधे धृतराष्ट्र दुःशासन यहाँ सभी कर्म बन गया किसका कुरुक्षेत्र का रणक्षेत्र तभी आस्था के प्रश्न पर सब यहाँ मारीच से निकले ईश्वर जिनके लिए छलिया कपटी धूर्त निकले मंदिर , मस्जिद, गिरजा बना कर पूजते है सभी वक़्त आने पूजा का घर जला जाता है हर कोई आज पूज लो भगवान जितने बना बैठे हर कही समय कि धारा में वो भी बह जायेगे कहीं ना कहीं बिजलियों के बीच रहता है जैसे हर यहाँ हर कोई गरीब का साया बिना बात छीन लेता है हर कोई ईशु, मीरा, सुकरात ज्ञानेश्वर बिष पी जी गए सभी मसीहा आ कर दुनियाँ में रो कर क्या गए यहोँ सभी भगवान को परख डालोगे परख नालियों में तूम सभी स्वार्थ के क्या कहने स्वयं को विधाता बुलाते हो सभी आराधना राय "अरु"

नज़्म,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, गीत

गीत बहारों के नाम लिखती हूँ मैं तेरा इंतज़ार करती हूँ रोशनी कम ना थी मेरे दिल में बस तेरा इंतखाब करती हूँ सुरमई शाम जब भी आती है  साथ  खुशबु  संग लाती है लौट आएगी तेरे दामन में बच कर ख़ुशी कहाँ जाने वाली है मैं सजा लुंगी चाँद तारों को नूर कि इबादत  कहाँ होने वाली है रौशनी से कहाँ दिल खाली है  किस्मत  की शाम ना ढलने वाली है आराधना राय "अरु"

एक बदनाम औरत

दुनियाँ के दोहरेमापदंड पर जीवन ना जी के उसने उसी जीवन को स्वीकार किया जो उसका का था,जिसे जीने के लिए, किसी से छिपना नहीं पड़ा।                                             -----------------------------------------------------------------------------------------------------------------                                     " ज़र्द चेहरा गुम है रंगत दिल कहे कुछ और है                        बढ़ गई मुश्किल खुदाया हैरां मुस्लसल  कौन है " सुंदर दो जोड़ी आँखे चेहरे पर टिका कर जब उसने पूछा तो राजन मन ही मन में शेर  कह उठा , हालांकि शायर नहीं था वो पर उर्वशी को देख कर हो जाना चाहता था । "दो मिनट रुकेगे" , कार में बैठे राजन से उसने कहा  । कोई बात नहीं आप जाए में इंतजार करूँगा, गोरा सुंदर चेहरा , सुडौल देहयिष्ट, शिफोन ...

नज्म चेहरा

नज्म चेहरा तेरा चेहरा मुझे रकीब सा लगता है दूर होकर भी  करीब  सा लगता है दिल जल कर सुलग नहीं उठता है आज़माता हुआ गरीब सा लगता है दहर की आग में शहर  जलता है कैसा रिश्ता तुझ से मेरा लगता है सताए हुए है चोट दिल पर लगी है ना जाने कौन ये मुझ पे हँसता है आराधना राय "अरु"

अप्सरा को मात

अप्सरा को मात ------------------------------ अप्सराओं में सब से सुंदर अप्सरा ने सोचा आज पृथ्वी लोक जा के वहाँ कि सुंदर स्त्रियों से मिले । जल्दी जल्दी में  वो  इक उद्यान में आ  गई , किस्मत से वहां सब लडकियाँ और लड़के खड़े थे दिन भी विचित्र 14 फरवरी ।                                                 दृश्य- 1                                 (उर्वशी इक लड़के से पूछती है ) उर्वशी-- वत्स ये पुष्प क्यों ? लड़का- आंटी कौन से टी. वी प्रोग्राम के लिए मुझे बकरा बना रहीं है ? (ऊपर से नीचे उर्वशी को देख कर ) उर्वशी को अपनी गलती का भान होता है और तुरंत गेटउप बदलती है । एक सुंदर लड़की के रूप में फिर खड़ी हो जाती है  । तभी एक लड़का 18-20 साल का आता है हाथों में गुलाब लिए  ।   लड़का -  विल यु बी मय वेलेंटाइन ?               ...

नज़्म

तेरे जाने के बाद तुझसे गिला नहीं शिकवा,शिकायत आरज़ू ,बाकी नहीं पत्थर है दिल नहीं जिंदगी में जुस्तजू तेरे सिवा कोई नहीं आती बहारें लौट जाए तेरे हसीन मकान से ऐसा कब हो सका है किसी चारागार में जीने के लिए काफ़ी है मेरी टूटी सी झोपड़ी तेर फरेबी वादों से अच्छी है खरी बात नए मरहले अभी है इन मरहलों के बाद आराधना राय "अरु"

क्या देखते हो

क्या देखते हो ठहरे हुए पानी में क्या देखते हो गुज़रे वक्त की पेशानी पे क्या देखते हो छलक जाती है मेरी आँखे क्यों पोछते हो जुल्म कर जाते हो हर बार मुझ पे चोट को आकर क्या कभी देखते हो दर्द पूछा होता ठहर जाने का मुझ से खो चुकी दरिया की रवानी क्या देखते हो हँस रहा था सारा ही जहान मुझ पर मेरी लाचारी को क्यों तूम देखते हो हँस तो दिए तुम मेरे छाले देख कर आँखों के मेरे जाले देख कर किसलिए कुफ्र रोज़ ढाते हो तुम मंदिर ,  मस्जिद हर रोज़ गिरते हो तुम आराधना राय "अरु"

देखिये

मेरे पहलू में भी आ कर देखिए दिल से दिल मिलाकर देखिए मेरे हमदम की गाई ग़ज़ल साथ मेरे गुनगुनाकर देखिए नफरतों कि बस्तीयों को भूल कर प्यार कि दुनियाँ बसा कर देखिए मुश्किलों में तो थपेड़े धुप के साथ मेरे भी खा कर देखिए आप के कन्धे पे रखा है सर प्यार से थपथपा कर देखिए लाए है तोहफ़े में हम जां और ज़िगर आप नजरें उठा कर देखिए ग़र खता कोई नहीं कि आपने आँखों से आँखों मिला कर देखिए चाँद तारों से भला क्या पूछना "अरु" खुद ही आकर देखिए आराधना राय "अरु"

दोस्तो देख लो

करम कैसा ये उल्फतो का अजब है दोस्तो देख लो पड़े हैं  उनकी  रहमतो पर गज़ब  दोस्तो देख लो खतावार  हुआ खुद  गम का  शिकार रास्ता देख लो रहम यहाँ किस के दिल के करीब  दोस्तों देख लो कड़ी दरवाजे की बंद कर के दुनियाँ  से वास्ता देख लो आँख बंद कर के सहरा -ओं के सराब  दोस्तों देख लो बड़े अदब का क़ायदा रिवायत उनकी कायदा देख लो हर इक पल  तराशा उन का हिसाब  दोस्तों देख लो आराधना राय "अरु"
अधुरा गीत -------------------- गीत अधुरा रह गया मौन अनकहा रह गया प्रीत की बतिया  कही मन  तृष्णा  कह गया बसंत रीता  रह  गया हर रंग फीका रह गया साँझ विरहन भाई नहीं मौसम अधुरा रह गया साँझ की बेला का दीया सिसकता हुआ रह गया चूड़ियाँ टूटी सुहाग की हिय का गहना खो गया सरहद पे सिंदूर पुछ गया देश के नाम पीया तू गया आँसुओं से स्वपन लिखा पीड़ा में उमड़ के कह गया धरोहर रख कर कैसी गया आँखों में आँसू  छोड़ गया अपनी यादों की निशानी सूनी कलाई में देकर गया देश मेरा वीरान  हो गया बेटी का दर्द बेगाना  गया  रिश्तों को तिलांजलि में मोल-भाव में  व्यर्थ गया दुल्हन की लाज ले  गया डोली क्या अर्थी सजा गया  सोता रहा चादर ओढ़ कर बेटी का अपहरण हो गया वेदना का मुँख खुल गया जीवन,मृत्यु के नाम गया तरस अन्नदाता अन्न को प्राणों का मोह ही रह गया काज़ल आँखों का बिध गया हदय पे आघात कर के गया मूक हो पथ पर तूम बैठे हो  जिव्हा से मानों  स्वर गया  दुःख में मुस्कान बिखरा गया अंधकार की ज्योति  हो गया...

तुम्हारा

ग़ज़ल ------------------------------------------------------------------------------------------------- बे वजह नाम तो मेरा न पुकारा होगा आपके प्यार का ये एक इशारा होगा जख्म को मेरे इक तेरा सहारा होगा अभी भरा है  कभी तो ये  हरा होगा  दर्द सीने मे उसके भी उठता होगा   चाँद तन्हा है इक दिन हमारा होगा  कच्ची मिट्टी के घर मे  गुजारा होगा  शहर का तुनक मिज़ाज़ ना प्यारा होगा .   इन अंधेरों का कोई  तो उजाला होगा   दर्द सीने का भला किसको गवारा होगा   माँ का दिल भी दर्द से तड़पा होगा अरु ,   चोट खा कर जब अश्क उमड़ता होगा आराधना राय "अरु"

कहे क्या

कहे क्या वो आज़माने आये है खुद का जी बहलाने आये है कहाँ से रंज इतना संग लाये है बिन पिये ही वो लडखडाये है किसी सोच से वो टकरा आये है इक मुद्दत के बाद वो मुस्कुराये है खुदी का सौदा जब कर आए है कहे क्या किस बात पर पछताये है वक़्त की  चाल  देख आए है आईने से आज क्यों वो घबराये है बड़े नाज़ से वो  समझाने आए  है लगा जैसे वो हमारे "अरु "हमसाये है आराधना राय "अरु"

दिल ने पाया है

गीत --------------------------- दर्द दिल ने पाया है जीने का सहारा है ढल चुके नगमों में हाले- गम हमारा है दर्द दिल ने----------------- वक्त ये हँसी कब है जो मोड़ पे पुकारा है आए ना खबर कुछ भी किसे साथ ये गवार है दर्द दिल ने----------------------- जिंदगी इक दरिया है वक़्त में हम धारा है संग-संग ही चलना है क्या अजब इशारा है दर्द दिल................. आराधना राय "अरु"

ग़ज़ल मंच की बात

30 जनवरी 2016 इस मुबारक दिन को प्रतिभा -मंच की  कामयाबी का जश्न कहा जाए तो ठीक ही होगा । गुलदस्ता -ए -ग़ज़ल , प्रतिभा मंच का यह पहला काव्य साँझा काव्य संग्रह है। यह अपनी तरह का पहला संकलन है,गौर करने की बात है , इसमें उर्दू की सभी गज़ल - हिंदी कविता देवनागरी लिपि में है।  अपने आप में अनमोल खास -और आम अवाम ( जनता )  की बात कहती ग़ज़ल वतन- परस्त शायर असद निज़ामी साहब के संपादन में 84 कलमकारों की आवाज़ है।  "उर्दू को हिंदी की जुबां से सुनिए" की आवाज़ को तीन महीने पहले असद निज़ामी साहब ने बुलंद हो कर एक  हिंदी को उर्दू अदब के साथ जोड़ कर वह्ट्स एप पर ग्रुप बनाया जो करीब एक हफ्ते में फेसबुक पर प्रतिभा-मंच के नाम से पहले दिन एक घंटे में 1500  लोगों से जुड़ गया । आज इस में करीब 16000 लोग हैजो अपनी मर्ज़ी से जुड़े है। सीधी -साधी जुबां में कहूँ तो हिंदी और उर्दू के माँ- और मौसी के रिश्ते की तरह, गैर मुस्लिम- और मुस्लिम दोनो एक छत के नीचे ज़मा है। जो आज की तारीख में हिंदू -मुस्लिम एकता की बात कहते है ।  प्रतिभा-मंच में खासा इंतजाम  किया गया ग़ज़ल सीखने ...

फासले हुए है

साभार गुगल मेरे नाम दिन के उजाले हुए है अंधेरों को हम क्यों पाले हुए है किन मज़बूरियों में ढाले हुए है हालत तंग दिल में छाले हुए है ख्वाब क्यों हमने पाले हुए है हसरतों कि ख्वाहिशें वाले हुए है बिना बात दिल में जाले हुए है किन महफिलों के हवालें हुए है लगी बात दिल पे मतवाले हुए है इंसानों में अजब "अरु" फासले हुए है आराधना राय "अरु"   ©

नजाब शाहिद मिर्ज़ा "शाहिद" के मिसरे के ऊपर कही गई ग़ज़ल

तिभा-मंच की ओर से नजाब शाहिद मिर्ज़ा "शाहिद" के मिसरे के ऊपर कही गई ग़ज़ल---आर काफिया -रदीफ किसलिए फिलबदी -110 से हासिल आश्यार अर्ज़ है मतला - लोगों की नज़र में बने खार किसलिए चलती है बात-बात में तलवार किसलिए ----------------------------------------------------------------------- मतला -2 रातों को जागते रहे नाउम्मीदी किसलिए सहते रहे है दर्द हुए बीमार किसलिए ------------------------------------------------------------------------------------------------- जुबां से तीर -ओ- खंज़र चलाए हज़ार बार खामोश हो गए है तलबगार किसलिए ----------------------------------------------------------------------------------------------- ज़ख़्म मिले है लोगों से जहां में बार बार नासूर बन बहे है हरबार किसलिए ------------------------------------------------------------------------------------------------- नुमाईश सी बाज़ारों में सजती है लडकियाँ गुरबत के हाथ रोज़ तिरस्कार किसलिए ---------------------------------------------------------------------------------------------- बन गया बाज़ार रातों -रात मेरा तमाम देश इ...

मेरी सांसों में

मेरी सांसों में कविता ------------------------------------ तुम बसें हो मेरी सांसों में  मेरी धड़कन में तुम समाते हो  मैं थरथरा रही हूँ लों की तरह तुम मेरे साथ -साथ जलते हो गुम रह कर देख ली दुनियाँ तुम अपनी साँस से महकते हो तेरे संग रह कर पा लिया है तुझे तुम मेरे रोम- रोम में बसते हो मेरी नज़रों में धुंध सी रहती है तुम किसी धूप सा मुस्कुराते हो तेरे कदमों में ज़माना पड़ा "अरु"तुम साया बन कर आते हो आराधना राय "अरु"

तराना बहार का

चिडियों ने गाया तराना बहार का रस्मों- रिवाज़ छोड़ कर सब्र-ओ-करार का उसकी नादानियां भी कबूल हो गई वादा निभाया जिसने अपने हज़ूर का दोस्तों ने अपनी सब आदत बदल  ली करना ना छोड़ा ज़िक्र मेरे शहर का मालूम क्या रास्तों वो ही  मिले मुझे साथ देता रहा कोई मेरी राहगुज़र का ढूंढने से कोई इंसान  दिखाई नहीं दिया देख लिया हाल  हमने अपने भी शहर का सूरज ने उग कर फलसफा यही दिया मुदद्त के बाद देखा "अरु" घर हमने सहर का आराधना राय "अरु"

तो क्या होता

रदीफ- तो क्या होता- काफिया होता, क्वाफी-पता , अता,रहता आता खता -------------------------------------------------- इश्क ना होता बता तो क्या होता खुदा सामने होता तो क्या होता उनकी नज़रों से गिरा तो क्या होगा संभल कर चलना आता तो क्या होगा उसका जीना मरना मेरे संग होता बन कर मुरीद रहता तो क्या होता बंदगी उसकी तिजारत ना होती होता वफ़ा का पता तो क्या होता निगाहों का गिरना उठाना ना होता उसका करम होता अता तो क्या होता उस की अंजुमन से उठ जाते क्या होता सह जाते "अरु" खता"तो क्या होता ©  आराधना राय "अरु"