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अतुकांत

साभार गुगल अतुकांत विश्वास के छोर होते है एक छोर तुम्हारे हाथ में होगा जो कही राह में छुटगया होगा एक छोर मेरे हाथ में साथ बन कर चल रहा है विश्वास का कुछ अगर टुटा सा मिले तो समझना दिल था मेरा क्युकी क्योकि विश्वास की डोर में दिल ही बंधे होते है जो टूट जाए दिल होते है विश्वास नहीं टूटते आराधना राय अरु

सुबह से पहले

.शाम धुंधली हुई जाती है.  सुबह से पहले रात आई है तेरा मिलना न मिलना इतफाक सा रहा होगा वरना गेरों का होसला इतना  बढ़ गया होता रात आयगी चुन लेगी अपनी नज़र से तुम्हे मैं सुबह सी तेरे द्वार पर नज़र आ जाउंगी काश ये ज़िन्दगी मेरी  वफ़ा  का इनाम  होती दूर से तेरेआने की सदा तुझ से पहले जाना लेती  मन का दीप जला कर  बुझा देता है यहाँ कोई हम शमा के आसरे ही तकदीरी बना  बैठे है नूर मंदिर का हो या मस्जिद  या गिरजे का लो तो लौं है वो रोशनी कर के ही कही जाएगी आराधना राय 'अरु'

रेज़गारी

बात1976 की है, हम उन दिनों राम कृष्ण पुरम सेक्टर -6 में रहते थे।  मुझे तो आज तक उस घर का नम्बर भी याद है, A 198 पास ही स्कुल था और  स्कुल के सामने घर। बड़ी दीदी को 5 पैसे मेरी मझली दीदी को भी 5 पैसे और भाई और मुझे भी 5 पैसे रोज़ के मिलते थे। पांच पैसे मेरे हाथ में जैसे ही आए.में आइस बार लेने की सोची, बड़ी दीदी ने चुपचाप एक गुलक में डाल दिए। मझली दीदी को क़िताबे पढने में रूचि थी पर किराये पर भी किताब 25 पैसे में थी,सो उनके पैसे भी गुलक में गए भाई स्कूल पेदल आता जाता था सो   उसके पाच पैसे भी गुलक में गए। शाम तक 5 पैसे को हाथों में लेकर बैठी रही,क्या पाता बर्फ का गोला मिल जाए या राम जी की खट्टी -मिट्टी गोलियां,पर घर के आस पास कोई खोमचे वाला नहीं आया था। बड़ी दीदी 12 साल की थी मझली दीदी 9 साल की और मैं और भाई जुड़वाँ थे, 6 साल के। उस दिन लगा, काश बड़े होते तो मज़े से पैसे को जेब में रख कर गोला तो खा ही सकते थे।उस दिन वाला सिक्का क्या हर दिन ५ पैसे गुल्क पे मेहरबान हो गए। बड़ी दीदी ही सब में समझदार थी,उन्होंने कहा महीने भर बाद सब सब के पैसे इक्कठे हो जाएगे तब कुछ खरीदेगे , दीदी ब...

चाँद

चाँद के साथ चाँदनी खिलखिलाती रही  तेरे बहाने से खुशियाँ दरीचे से आती रही  तू सहर सा मेरे दर को रोशन करती रही तू मेरे घर में चाँद बन के जगमगाती रही  वो खूबसूरत सा चेहरा ईद सा चाँद ही रही इसी बहाने "अरु"बहार बन के वो आती रही आराधना राय

नज्म

    नज्म इश्क़ कि बाते सभी करते है क्या जाने   दिल अपना के रखते है क्या वो क्या जाने इश्क़ का जादू है मिराज़ है धोका क्या जाने मर कर जीते  है रस्म ए अदायगी क्या जाने आग सीने में लगी है दिल का तमाशा क्या जाने  दो बूंद थे दिल के छलक गए वफा  के नाम क्या जाने वो खाक उड़ाते है, रास्तों पर क्यू  कहाँ क्या जाने हम उनको दुआ देते है,रह रह कर अरु क्या जाने नज्म आराधना राय अरु नज्म में भार तोल माप होता है पर रदीफ और काफिया नहीं

दिन ढले तो रात मेरी रो जाती है

 गोया की ग़ज़ल हूँ खामोश सी रहती हूँ तेरे आस- पास हूँ मगर गुम सी रहती हूँ दुखतर सा दुख लिए दो शीज़ा कहती हैं रात होते हीदिन की परेशनी है दिन ढले तो रात मेरी रो जाती है, जिंदगानी का सफर रो रो कर जीने वालो हँस से दाने चुगते है, मंटो की लिखी किताब हूँ .पाथेर पांचाली भ्रमकीताब हूँ य चंदरबरदाई की गाथा ऐ सनम बता कौन हूँ चंदकांता............... घात की गहराई रोमियो- जूलियट............................\आराधना राय अरु

ग़ज़ल ---------

साभार गुगल    इश्क में किसने कैसा सवाल रखा है    सिर्फ मजबूरियों को उछाल रखा है     तुझे पा कर भूल जाना नसीब गर है      ज़ख़्म खा कर दिल को बहाल रखा है         उसकी रुसवाई मेरी रुसवाई बनी है    यही कह कर खुद को संभाल रखा है    बीते लम्हों को दिल से लगा रखा है    पूछ हमने कैसे तिरा ख्याल रखा है    रकीब ने घर का रास्ता देख रखा है  "अरु"  परेशनियों को हमने मोल रखा है     आराधना राय "अरु"    मोल--- खरीद   रकीब ---- दुश्मन

क्यू है

साभार गुगल क्यू है ------------------------------------------------- ये कहानी नहीं हक़ीक़त है मुझे तू सुनाता क्यू है दिल के राज़ तू अपने होठो पे खुद लाता क्यू है कुछ मज़बूरी रही होगी उसकी  बहलाता क्यू है चोट दिल पे थी लगी खुद  से वो छुपाता  क्यू है  बात नहीं  उस से  तो जुड़ा सिलसिला  क्यू है  बुत सा बना कर  छोड़ दिया  उसे भूल जाता क्यू है कौन सी बात है खता अपनी हर बार दोहराता क्यू है आराधना राय "अरु"

जिंदगानी

साभार गुगल  नज़्म------------ मिट्टी में पल रही है हसीन जिंदगानी कंधो पे उसके है कितनी ज़िम्मेदारी वक्त ने दिखाई हमको अजब हक़ीकत जो जानते है सब कुछ उनसे हुई दुश्वारी तुम मानो या ना मानो हमको यही यकीं है अपनों में रह कर तूम कुछ कर लो पर्दादारी जो साथ तेरा निभा दे बावफा के बेवफ़ा है रखना साथ उसके तू थोड़ी सी ईनामदारी आराधना राय "अरु"

सनम

साभार गुगल नज़्म बगेर रदीफ और काफिए कि लिखी जाती है---और एक उन्वान पे लिखी जाती है   सनम -------------------------------------------------- आज जान पे बन आई है सनम आग सीने में लगी गई है सनम पत्थर दिल लिए बैठे है सनम किस से खेल कर बैठे है सनम मय मीना और मैखाना लिए है फिर तुझे ही हम खोजते है सनम रात  का दिन पर पहरा है कायम  हम बस तुझे ही  देखते है सनम आराधना राय "अरु"
एक नजर मैं भी पाना चाहती हूँ--- गज़ल अपनी पूर कहना चाहती हूँ---------- गीत बन कर लब पे आना चाहती हूँ मुस्कुरा कर तुझ को पाना चाहती हूँ चाक दामन कर अपना क्या दिखाऊँ इश्क़ रब है नहीं आज़माना चाहती हूँ राज़ ए दिल अपना बताना  चाह्ती हूँ अश्क तेरे कांधो पर बहाना चाहती हूँ तेरे आँगन मे दिया अपना जला कर रोशनी  बन  तिरे घर में आना चाहती हूँ तेरे सजदे में खुदाया  आकर गिरा हूँ दुआ बन के लब पे आना चाहती हूँ सारी दौलत इक तरफ रखकर "अरु" माँ  के आँसू रोज़  पीना चाहती  हूँ आराधना राय अरु

ग़ज़ल गैर मुरदफ ग़ज़ल --- बिना रदीफ कि ग़ज़ल

सखी गीता के नाम साभार गुगल              उन से हटती नहीं अब मिरी नज़र        चुभ रही है दिल में कांटे सी गज़र               तिरे गावँ कि छांव को छोड़ कर           चल पड़े हम अपना मुँह मोड़ कर          अहले गमों को देख कर रो पड़े         बिखर गए जज्बात इधर - उधर                रंग बिखर गए हर तस्वुरात के           तस्वीर बनाई नहीं तिरी दिल हार              जिंदगी चलती रही खामोश इधर           आ गए साथ मेरे बन कर रहबर                   उन के इकरार कि किसको खबर         जिनका रोना  भी आता नहीं नज़र              उन से हटती नहीं अब मिरी नज़र        चुभ रही है दिल में कांटे ...

बात नज़्म

बात ============================== बात है राज़ क्या यू बताये अपना ये हकीकत है वो मानते है सपना कौन कैसे जाने कब जी ही जाता है कौन मुक़दर को यू ही आज़माता है मुझे साहिल कभी यू मिले ही नहीं समुंदर मैं डूबी यू ही चली जाती हूँ हम जिए या ना जीये तेरे अरमान में ज़िन्दगी अपनी रौ में बही ही जाती है कल का सामान बांध ले तू बस अभी आज कि रुखसती "अरु" हुई जाती है आराधना राय

ग़ज़ल

  साभार गुगल बीता लम्हा था क्यों याद करे  किससे जीने कि फरियाद करें  गम मिला जिन्हें उम्र भर मिला  घर उनका खुशियों से शाद करें  दर्द ए दिल का आज मातम करें कल नए सपनों को हम साद करें उठे हो हाथ दुआ के लिए गर तिरे बद्ददुआ दे कर ना कोई बरबाद करें आराधना राय "अरु"

ग़ज़ल

तिरे गम को चुप चुप  हम पीते है दिल के खून से अपने मुहँ धोते है बड़े नाज़ से उठाए जिन के नखरे बिछड कर उन से आज हम रोते है रंज इतने ना थे जिन पर दिल रोया रूठ कर जितने हम हबीबो को खोते है उठ कर चले जाते बज़्म ए गम से तेरी मुड़ कर ना पूछते तिरे गम क्यों ढोते है आराधना राय अरु

ग़ज़ल

साभार गुगल तिरे गम में मिली जग हंसाई है दिल को राहत कब मिल पाई है जान मेरी जान पर बन आई है किस्मत में मिली हमें रुसवाई है ये तिश्नगी भी किसे रास आई है गम -ए  दिल ने पाई तन्हाई है मिरे चेहरे पे अजब रंगत छाई है आब ए हयात  बन तू मुस्कुराई है आराधना राय "अरु"

नज़्म

रोज़ खून से जिंदगी नहाती रही है दो निवालों के लिए बंटती रही है अंदर बाहर घर में पिसती रही है जिंदगी घाव सी तू रिसती रही है ज़िस्म में बस टीस सी उठ रही है बे बात कसौटी पर कसती रही है रात दिन  कसमसाती रह गई है इंतजार किस का करती रही है जिंदगी दो पाटों में बंटती गई है जिंदगी तू मुझे कहाँ मय्सर हुई है टुकडों - टुकड़ों में मिलती रही है आराधना राय "अरु"

कविता अतुकांत

जो नहीं मिला  उस कि तलाश में सब है ताश के घर में सब  के सब बंद है पुरजे- पुरजे हो कर  अभी बिखरा है जोड़ -जोड़ कर पैबंद  सा सीते है सभी मर कर भी ख़ुश ही  इस दुनियाँ मैं कागजों का व्यापार  ढूंढते है सभी सोचते है पैसो से खरीद  ली दुनियाँ इश्क़ भी खरीदते है  वही ना जाने किसकी  मजबूरियों को प्रेम, इश्क, वफ़ा का  नाम दिया उसे खरीद कर ना जाने किस  दिल के साथ खिलवाड़ किया प्रेम , ढाई शब्दों का ही सही लेकिन करोड़ों में नहीं बिकता अभी क्योकि इस दुनियाँ मैं राधा-कृष्ण सा प्यार नहीं मिलता कभी आराधना राय "अरु" जो नहीं मिला वो एतबार ढूंढते है  अपना खोया हुआ विश्वास ढूंढते है 

नग्मा प्यार का

साभार गुगल फूलों से सुना नग्मा प्यार का हाल सुनाया सबा ने इज़हार का --------------------------------------------------------------------------------- लम्हा दर लम्हा गुज़रा तूफान का दिलों के बीच रिश्ता क्या इकरार का --------------------------------------------------------------------------------- शज़र पे बरसा आफताब आग का कितना तवील था मौसम इंतजार का --------------------------------------------------------------------------------- सफर सुहाना रहा घटा से मेहताब का कली ने सीखा तराना दिल के क़रार का --------------------------------------------------------------------------------- जलता रहा दिया मेरी टूटी दीवार का रात भर अश्क बहा उसके इंकार का --------------------------------------------------------------------------------- खिज़ा ने किया है रुख ठंडी हवाओं का नीद में चुनते रहे ख्वाब इसरार का --------------------------------------------------------------------------------- वो बनाता रहा बहाना इक्लाक़ का रास ना आया "अरु" मौसम खार का आराधना राय "अरु"

गीत---- नज़्म

आपकी बातों में जीने का सहारा है राब्ता बातों का हुआ अब दुबारा है अश्क ढले नगमों में किसे गवारा है चाँद तिरे मिलने से रूप को संवारा है आईना बता खुद से कौन सा इशारा है मस्त बहे झोकों में हसीन सा नजारा है अश्कबार आँखों में कौंध रहा शरारा है सिमटी हुई रातों में किसने अब पुकारा है आराधना राय "अरु"