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कहे क्या

कहे क्या वो आज़माने आये है खुद का जी बहलाने आये है कहाँ से रंज इतना संग लाये है बिन पिये ही वो लडखडाये है किसी सोच से वो टकरा आये है इक मुद्दत के बाद वो मुस्कुराये है खुदी का सौदा जब कर आए है कहे क्या किस बात पर पछताये है वक़्त की  चाल  देख आए है आईने से आज क्यों वो घबराये है बड़े नाज़ से वो  समझाने आए  है लगा जैसे वो हमारे "अरु "हमसाये है आराधना राय "अरु"

दिल ने पाया है

गीत --------------------------- दर्द दिल ने पाया है जीने का सहारा है ढल चुके नगमों में हाले- गम हमारा है दर्द दिल ने----------------- वक्त ये हँसी कब है जो मोड़ पे पुकारा है आए ना खबर कुछ भी किसे साथ ये गवार है दर्द दिल ने----------------------- जिंदगी इक दरिया है वक़्त में हम धारा है संग-संग ही चलना है क्या अजब इशारा है दर्द दिल................. आराधना राय "अरु"

ग़ज़ल मंच की बात

30 जनवरी 2016 इस मुबारक दिन को प्रतिभा -मंच की  कामयाबी का जश्न कहा जाए तो ठीक ही होगा । गुलदस्ता -ए -ग़ज़ल , प्रतिभा मंच का यह पहला काव्य साँझा काव्य संग्रह है। यह अपनी तरह का पहला संकलन है,गौर करने की बात है , इसमें उर्दू की सभी गज़ल - हिंदी कविता देवनागरी लिपि में है।  अपने आप में अनमोल खास -और आम अवाम ( जनता )  की बात कहती ग़ज़ल वतन- परस्त शायर असद निज़ामी साहब के संपादन में 84 कलमकारों की आवाज़ है।  "उर्दू को हिंदी की जुबां से सुनिए" की आवाज़ को तीन महीने पहले असद निज़ामी साहब ने बुलंद हो कर एक  हिंदी को उर्दू अदब के साथ जोड़ कर वह्ट्स एप पर ग्रुप बनाया जो करीब एक हफ्ते में फेसबुक पर प्रतिभा-मंच के नाम से पहले दिन एक घंटे में 1500  लोगों से जुड़ गया । आज इस में करीब 16000 लोग हैजो अपनी मर्ज़ी से जुड़े है। सीधी -साधी जुबां में कहूँ तो हिंदी और उर्दू के माँ- और मौसी के रिश्ते की तरह, गैर मुस्लिम- और मुस्लिम दोनो एक छत के नीचे ज़मा है। जो आज की तारीख में हिंदू -मुस्लिम एकता की बात कहते है ।  प्रतिभा-मंच में खासा इंतजाम  किया गया ग़ज़ल सीखने ...

फासले हुए है

साभार गुगल मेरे नाम दिन के उजाले हुए है अंधेरों को हम क्यों पाले हुए है किन मज़बूरियों में ढाले हुए है हालत तंग दिल में छाले हुए है ख्वाब क्यों हमने पाले हुए है हसरतों कि ख्वाहिशें वाले हुए है बिना बात दिल में जाले हुए है किन महफिलों के हवालें हुए है लगी बात दिल पे मतवाले हुए है इंसानों में अजब "अरु" फासले हुए है आराधना राय "अरु"   ©

नजाब शाहिद मिर्ज़ा "शाहिद" के मिसरे के ऊपर कही गई ग़ज़ल

तिभा-मंच की ओर से नजाब शाहिद मिर्ज़ा "शाहिद" के मिसरे के ऊपर कही गई ग़ज़ल---आर काफिया -रदीफ किसलिए फिलबदी -110 से हासिल आश्यार अर्ज़ है मतला - लोगों की नज़र में बने खार किसलिए चलती है बात-बात में तलवार किसलिए ----------------------------------------------------------------------- मतला -2 रातों को जागते रहे नाउम्मीदी किसलिए सहते रहे है दर्द हुए बीमार किसलिए ------------------------------------------------------------------------------------------------- जुबां से तीर -ओ- खंज़र चलाए हज़ार बार खामोश हो गए है तलबगार किसलिए ----------------------------------------------------------------------------------------------- ज़ख़्म मिले है लोगों से जहां में बार बार नासूर बन बहे है हरबार किसलिए ------------------------------------------------------------------------------------------------- नुमाईश सी बाज़ारों में सजती है लडकियाँ गुरबत के हाथ रोज़ तिरस्कार किसलिए ---------------------------------------------------------------------------------------------- बन गया बाज़ार रातों -रात मेरा तमाम देश इ...

मेरी सांसों में

मेरी सांसों में कविता ------------------------------------ तुम बसें हो मेरी सांसों में  मेरी धड़कन में तुम समाते हो  मैं थरथरा रही हूँ लों की तरह तुम मेरे साथ -साथ जलते हो गुम रह कर देख ली दुनियाँ तुम अपनी साँस से महकते हो तेरे संग रह कर पा लिया है तुझे तुम मेरे रोम- रोम में बसते हो मेरी नज़रों में धुंध सी रहती है तुम किसी धूप सा मुस्कुराते हो तेरे कदमों में ज़माना पड़ा "अरु"तुम साया बन कर आते हो आराधना राय "अरु"

तराना बहार का

चिडियों ने गाया तराना बहार का रस्मों- रिवाज़ छोड़ कर सब्र-ओ-करार का उसकी नादानियां भी कबूल हो गई वादा निभाया जिसने अपने हज़ूर का दोस्तों ने अपनी सब आदत बदल  ली करना ना छोड़ा ज़िक्र मेरे शहर का मालूम क्या रास्तों वो ही  मिले मुझे साथ देता रहा कोई मेरी राहगुज़र का ढूंढने से कोई इंसान  दिखाई नहीं दिया देख लिया हाल  हमने अपने भी शहर का सूरज ने उग कर फलसफा यही दिया मुदद्त के बाद देखा "अरु" घर हमने सहर का आराधना राय "अरु"

तो क्या होता

रदीफ- तो क्या होता- काफिया होता, क्वाफी-पता , अता,रहता आता खता -------------------------------------------------- इश्क ना होता बता तो क्या होता खुदा सामने होता तो क्या होता उनकी नज़रों से गिरा तो क्या होगा संभल कर चलना आता तो क्या होगा उसका जीना मरना मेरे संग होता बन कर मुरीद रहता तो क्या होता बंदगी उसकी तिजारत ना होती होता वफ़ा का पता तो क्या होता निगाहों का गिरना उठाना ना होता उसका करम होता अता तो क्या होता उस की अंजुमन से उठ जाते क्या होता सह जाते "अरु" खता"तो क्या होता ©  आराधना राय "अरु"

दुश्वारी

जिंदगी के नाम लिख कर दुश्वारी नेता अपनी चाल -चल कर आए नून, तेल, लकड़ी हाय मंहगाई आप अपना जनाज़ा ले कर आए इक फज़ीहत भला किस को नहीं भाए गाँव के खेत बेच कर नया मकान ले आए राहत के नाम राहत सोच कर पछताए कहाँ से ढूढ़ कर इत्मिनान के पल ले आए सिल-सिला कौन सा मुझ को तुझ से जोड़ जाए रहन पे सामान बाज़ार से सब उधार लाए कौन सारी रात जलता अंधेरों में इक दिया अपनी किस्मत का अँधेरा "अरु"  खुद ले आए   © आराधना राय "अरु"

तमाशा हो गया

सौदा खुद बाज़ार में ये कैसा हो गया  तमाशाई खुद यहाँ पर तमाशा हो गया  कौन सा दिन कहर का नाज़िल हो गया  लोगों की दुश्वारी से कोई परेशां हो गया  दिल के जाने पर हादसा साथ हो गया  साहिल पे कश्तियाँ डुबों शर्मिंदा हो गया बयाँ कर सका ना कोई तकदीर हो गया जिंदगी तेरे हाथों कोई निराश हो गया सौ- मुश्किलें पड़ी दिल तार- तार हो गया बस्ती के लोगों के लिए  कहकशां सा हो गया अहसान फरामोश ही जब कारवां हो गया फ़कीरी में रहना भी "अरु" इक नशा हो गया ©   आराधना राय "अरु"

जान

जान नहीं जब पूरा नाता विभेद ह्रदय में उपज जाता ज्ञान नहीं कोई पूर्ण पाता बीच राह में भ्रमित हो जाता अधकचरी सी बात सुनाता असत्य सत्य नहीं बन पाता   © आराधना राय "अरु"

सुंदर-रूप तुम्हारा

सुंदर- सुमधुर रूप तुम्हारा सागर जल ममता से हारा देव आरती क्या मैं कहलाऊँ सहज सुधा जीवन तुम्हारा भेद नहीं कहो क्या मैंने जाना तुमने राम संग जीवन पहचाना अतुलित परम ही धर्म तुम्हारा संग- साथ ना रहा कभी हमारा गर्भरत्न मात्र इक रहा सहारा क्यों ना दिया तुमने साथ हमारा आराधना राय "अरु"
कविता तब की जब "अना"नाम से लिखा पर "अना कासिमी से परिचय के बाद जाना की वो भी "अना है तब से मैं "अरु " नाम से लिख रही हूँ पैमाने और पैमानों के ऊपर कसी गई जूनून -ए जंग ऐसा की मौत से लड़ गई कांच के महलों में ,ये दीवानगी हो गई मेरी कहानी हर दरीचे को पता हो गई मैं रूह थी मेरा ना कोई मक़ाम रहा ज़र्रे ज़र्रे , बिखरी और निखर गई देर से जाना, अपने हिज़र का अंजाम सुबह होने तक मैं अपनी ज़बा खुद हो गई क्या कहे "अना" अपनी हम तुमसे खुद रोई मेरी दास्ता और फना हो गई आराधना राय "अरु" Tulika ग़ज़ल ,गीत ,नग्मे ,किस्से कहानियों का संसार

बदल गए

नज़ारे बदल गए किस्मत के सितारें बदल गए कितने चाहने वाले बदल गए जिंदगी के हाथों वक्त के धारें बदल गए बंटवारें में घर मिरा लूट लोग निकल गए आसबाब के साथ घर के लोग बदल गए चाहत के तूफान उठे दिल में देख दरिया के साहिल भी बदल गए रो -रो कर मुझे बुलाने वाले मेरी मईयत उठा कर बदल गए बस्ती दर्द और गम की क्या होती रोतों पे "अरु" मुस्कुरा कर लोग बदल गए   © आराधना राय "अरु"

सच जीवन का

सच जीवन का सोच कर यही पाया ज़िन्दगी तेरे हाथ क्या आया उम्र भर खोजते है जिसको हम बता हाथ कि खाली लकीरों के सिवा क्या पाया एक पल कही खुशियाँ भी खिलौना है और कहीं गमगीन मातम पाया जिंदगी सोच तूने क्या पाया जुल्म करना जिनकी हो फ़ितरत रो कर उन के सामने क्या पाया आराधना राय "अरु"

क्या मिला

उम्र भर का सिला मुझको क्या मिला गुम कर के खयालात तुझको क्या मिला सहारा में जैसे फूल खिला दशत में रो कर क्या मिला रुसवा किया सरेबाज़ार बता तुझको क्या मिला दिल अपना है बेजार गम-ए -दिल बता क्या मिला अपने माज़ी को किया याद बता तुझको क्या मिला हर्फ बिखरे मेरे उसके साथ अरु बता उसको क्या मिला आराधना राय "अरु"

मीरा

साभार गूगल अपने पिया की दर्श दीवानी भई गीत बना कर श्याम को सुनाई आस में पी के सुध बुध गवांई मीरा कृष्ण की दीवानी कहलाई विरहन रैना रो - रो कर बिताई पीड मसि बना आसूँ से लिखाई मीरा जन्म श्याम संग बिताईं श्यामा संग जग में प्रीत बढाई मुख देख पिया का कह ना पाई सोवत- जागत श्याम रटन लगाई जल की मछली जल बिन ना रह पाई "अरु" श्याम में जाकर मीरा समाई आराधना राय "अरु"

आने के बाद

साभार गूगल तेरे जाने के बाद तुझसे गिला नहीं शिकवा,शिकायत आरज़ू ,बाकी नहीं पत्थर है दिल नहीं जिंदगी में जुस्तजू तेरे सिवा कोई नहीं आती बहारें लौट जाए तेरे हसीन मकान से ऐसा कब हो सका है किसी चारागार में जीने के लिए काफ़ी है मेरी टूटी सी झोपड़ी तेर फरेबी वादों से अच्छी है खरी बात नए मरहले अभी है इन मरहलों के बाद आराधना राय "अरु"

पनाहों में होता

साभार गूगल 27-12-2015 सज़दा गर तेरी पनाहों में होता  असर कुछ इन दुआओं में होता मेरा घर रोशनी से आबाद होता इमान गर तेरी वफाओं में होता मंदिर ना मस्जिद ना खाक होता खुदा गर तेरी इन शिराओं में होता दिल का मकान यह खाली ना होता तेरा नाम गर इन सितारों में होता चाँद रात उन का हसीं दीदार होता चेहरा गर उनका ना हिज़ाबों में होता बसेरा अपना तेरे गाँव में "अरु" होता पैगाम तेरा गर इन फिजाओं में होता आराधना राय "अरु"

कहानी- पहचान

कितनी सुंदर कहानी है, कृष्णा ने अख़बार ला कर दिखाया गोविन्द कुछ ना बोला, अनमना हो कर उसने अख़बार एक तरफ रख दिया । तुम भी तो लिखते हो तुम्हारा नहीं छप सकता, मुस्कुरा कर गोविन्द ने कहा छपते है मेरे नाम से उपन्यास पर ऐसे लोगो के जो होते ही नहीं। कृष्णा हँस कर बोली अच्छा मैंने तो नहीं पढ़े, अब इस के बाद गोविन्द क्या कहता...........खुद लिखो और बाद में किसी और के नाम से पढो, कितना अजीब है, आखिर छदम नाम से लिखने के पैसे भी तो मिलते है। आज भी याद है एक कविता लिखी थी, फिर रात भर उसे गुनगुनाता रहा था, नहीं मालूम था कि पहली मंजिल पर रहने वाली कोयल सुन कर लिख रही है। अगले दिन कालेज में कविता हिंदी - विभाग में सम्मिलित करवा दी गई, पर करीब आधे - घंटे बाद मुकेश जी ने बुलाया, गोविन्द अचकचाया हुआ सा जब सामने पहुँचा तब कोयल कि कविता आगे कर मुकेश जी मुस्कुरा दिए," ये कह रही है कविता इस की है" ", दोबारा लिखवा ले इससे अच्छी लिख डालूँगा", गोविन्द ने पास से ही कलम उठाया और कागज़ पर लिखना शुरू कर दिया । दोबारा लिखी कविता पहले से कही ज्यादा अच्छी थी, मुकेश जी चुप रहे, कोयल के ख़िलाफ सबूत ...