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एक नजर मैं भी पाना चाहती हूँ--- गज़ल अपनी पूर कहना चाहती हूँ---------- गीत बन कर लब पे आना चाहती हूँ मुस्कुरा कर तुझ को पाना चाहती हूँ चाक दामन कर अपना क्या दिखाऊँ इश्क़ रब है नहीं आज़माना चाहती हूँ राज़ ए दिल अपना बताना  चाह्ती हूँ अश्क तेरे कांधो पर बहाना चाहती हूँ तेरे आँगन मे दिया अपना जला कर रोशनी  बन  तिरे घर में आना चाहती हूँ तेरे सजदे में खुदाया  आकर गिरा हूँ दुआ बन के लब पे आना चाहती हूँ सारी दौलत इक तरफ रखकर "अरु" माँ  के आँसू रोज़  पीना चाहती  हूँ आराधना राय अरु

ग़ज़ल गैर मुरदफ ग़ज़ल --- बिना रदीफ कि ग़ज़ल

सखी गीता के नाम साभार गुगल              उन से हटती नहीं अब मिरी नज़र        चुभ रही है दिल में कांटे सी गज़र               तिरे गावँ कि छांव को छोड़ कर           चल पड़े हम अपना मुँह मोड़ कर          अहले गमों को देख कर रो पड़े         बिखर गए जज्बात इधर - उधर                रंग बिखर गए हर तस्वुरात के           तस्वीर बनाई नहीं तिरी दिल हार              जिंदगी चलती रही खामोश इधर           आ गए साथ मेरे बन कर रहबर                   उन के इकरार कि किसको खबर         जिनका रोना  भी आता नहीं नज़र              उन से हटती नहीं अब मिरी नज़र        चुभ रही है दिल में कांटे ...

बात नज़्म

बात ============================== बात है राज़ क्या यू बताये अपना ये हकीकत है वो मानते है सपना कौन कैसे जाने कब जी ही जाता है कौन मुक़दर को यू ही आज़माता है मुझे साहिल कभी यू मिले ही नहीं समुंदर मैं डूबी यू ही चली जाती हूँ हम जिए या ना जीये तेरे अरमान में ज़िन्दगी अपनी रौ में बही ही जाती है कल का सामान बांध ले तू बस अभी आज कि रुखसती "अरु" हुई जाती है आराधना राय

ग़ज़ल

  साभार गुगल बीता लम्हा था क्यों याद करे  किससे जीने कि फरियाद करें  गम मिला जिन्हें उम्र भर मिला  घर उनका खुशियों से शाद करें  दर्द ए दिल का आज मातम करें कल नए सपनों को हम साद करें उठे हो हाथ दुआ के लिए गर तिरे बद्ददुआ दे कर ना कोई बरबाद करें आराधना राय "अरु"

ग़ज़ल

तिरे गम को चुप चुप  हम पीते है दिल के खून से अपने मुहँ धोते है बड़े नाज़ से उठाए जिन के नखरे बिछड कर उन से आज हम रोते है रंज इतने ना थे जिन पर दिल रोया रूठ कर जितने हम हबीबो को खोते है उठ कर चले जाते बज़्म ए गम से तेरी मुड़ कर ना पूछते तिरे गम क्यों ढोते है आराधना राय अरु

ग़ज़ल

साभार गुगल तिरे गम में मिली जग हंसाई है दिल को राहत कब मिल पाई है जान मेरी जान पर बन आई है किस्मत में मिली हमें रुसवाई है ये तिश्नगी भी किसे रास आई है गम -ए  दिल ने पाई तन्हाई है मिरे चेहरे पे अजब रंगत छाई है आब ए हयात  बन तू मुस्कुराई है आराधना राय "अरु"

नज़्म

रोज़ खून से जिंदगी नहाती रही है दो निवालों के लिए बंटती रही है अंदर बाहर घर में पिसती रही है जिंदगी घाव सी तू रिसती रही है ज़िस्म में बस टीस सी उठ रही है बे बात कसौटी पर कसती रही है रात दिन  कसमसाती रह गई है इंतजार किस का करती रही है जिंदगी दो पाटों में बंटती गई है जिंदगी तू मुझे कहाँ मय्सर हुई है टुकडों - टुकड़ों में मिलती रही है आराधना राय "अरु"

कविता अतुकांत

जो नहीं मिला  उस कि तलाश में सब है ताश के घर में सब  के सब बंद है पुरजे- पुरजे हो कर  अभी बिखरा है जोड़ -जोड़ कर पैबंद  सा सीते है सभी मर कर भी ख़ुश ही  इस दुनियाँ मैं कागजों का व्यापार  ढूंढते है सभी सोचते है पैसो से खरीद  ली दुनियाँ इश्क़ भी खरीदते है  वही ना जाने किसकी  मजबूरियों को प्रेम, इश्क, वफ़ा का  नाम दिया उसे खरीद कर ना जाने किस  दिल के साथ खिलवाड़ किया प्रेम , ढाई शब्दों का ही सही लेकिन करोड़ों में नहीं बिकता अभी क्योकि इस दुनियाँ मैं राधा-कृष्ण सा प्यार नहीं मिलता कभी आराधना राय "अरु" जो नहीं मिला वो एतबार ढूंढते है  अपना खोया हुआ विश्वास ढूंढते है 

नग्मा प्यार का

साभार गुगल फूलों से सुना नग्मा प्यार का हाल सुनाया सबा ने इज़हार का --------------------------------------------------------------------------------- लम्हा दर लम्हा गुज़रा तूफान का दिलों के बीच रिश्ता क्या इकरार का --------------------------------------------------------------------------------- शज़र पे बरसा आफताब आग का कितना तवील था मौसम इंतजार का --------------------------------------------------------------------------------- सफर सुहाना रहा घटा से मेहताब का कली ने सीखा तराना दिल के क़रार का --------------------------------------------------------------------------------- जलता रहा दिया मेरी टूटी दीवार का रात भर अश्क बहा उसके इंकार का --------------------------------------------------------------------------------- खिज़ा ने किया है रुख ठंडी हवाओं का नीद में चुनते रहे ख्वाब इसरार का --------------------------------------------------------------------------------- वो बनाता रहा बहाना इक्लाक़ का रास ना आया "अरु" मौसम खार का आराधना राय "अरु"

गीत---- नज़्म

आपकी बातों में जीने का सहारा है राब्ता बातों का हुआ अब दुबारा है अश्क ढले नगमों में किसे गवारा है चाँद तिरे मिलने से रूप को संवारा है आईना बता खुद से कौन सा इशारा है मस्त बहे झोकों में हसीन सा नजारा है अश्कबार आँखों में कौंध रहा शरारा है सिमटी हुई रातों में किसने अब पुकारा है आराधना राय "अरु"

ग़ज़ल--------मुलाकात

           साभार गुगल     तेरी मिरी पहली  मुलाक़ात है     जिंदगी प्यार कि सौगात है      कहगे न लब आँखों ने कही      कुछ कहे अनकहे ज़ज्बात है      रह गई इन फिजाओ में कहीं      आधी- अधूरी सी  हर बात है     बढ़ गयी दुश्वारियाँ मिरी कहीं     खुद से उलझते हुए ख्यालात है     चाँद , तारों  की फलक ने कही      मुड़ के तू  देख कैसी बारात है     अहले दिल मान जायेगे कहीं     आज राहों में बिछ रही बिसात है     दिल को तुझ से निस्बत है "अरु"     इक नई रिवायत कि शुरुआत है  आराधना राय "अरु"     

नज़्म ------------समाती रही

साभार गुगल वक्त कि धार पर मैं बहती  रही वो समुंदर था उसमे समाती रही दिल कि बातें  तेरी लुभाती रही हाल  ए दिल  अपना छुपाती रही गीत लबों से तेरा गुनगुनाती रही याद आ - आ कर तेरी तडपाती रही धड़कने दिल कि मेरी बताती रही  पास हर धड़ी तू है मेरे जताती रही जिंदगी मौत बन  करीब आती रही दिल से जां का रिश्ता निभाती रही ठहरे पानी में अक्स रोज़ देखती रही बात बनती बिगड़ती अरु देखती रही आराधना राय "अरु" وقت کہ کنارہ پر میں بہتی رہی وہ سمندر تھا اسمے سماتي رہی دل کہ چیزیں تیری مشابھت اختیار رہی حال اے دل اپنا چھپاتا رہی نغمہ لبوں سے تیری گنگناتی رہی یاد آ - آ کر تیری تڈپاتي رہی دھڑکنے دل کہ میری بتاتی رہی   پاس ہر دہی تو ہے میرے جتاتي رہی زندگی موت بن قریب آتی رہی دل سے جاں کا رشتہ ادا کرتی رہی ٹھہرے پانی میں عکس روز دیکھتی رہی بات بنتی بگڑتی ار دیکھتی رہی آرادنا رائے "ار"  

नज़्म जिंदगी

साभार गुगल नज़्म जिंदगी मेरी ग़ज़ल हुई तुझसे बिछडने के बाद रात कि मेरे सहर न हुई चाँद निकलने के बाद दिल ने सिर्फ तेरी सुनी अश्क बार होने के बाद मर्ज़ मेरा लाइलाज रहा दिले- बर्बाद होने के बाद आँच दिल को जलाती रही दीप की लो बन जाने के बाद जिंदगी मुझे म्यसर ना हुई तिरे चले जाने के बाद सुनी अनसुनी  सब रह गई  "अरु"  शबे जिंदगी चले  के बाद आराधना राय "अरु"

धुँआ

धुँआ ----------------------------------- धुँआ - धुँआ सी ज़िन्दगी ना मचल अब के बहार है खिज़ा की पहल हो चुकी ना देख जश्न- ए -बहार है वो तड़प रही ना मकाम अब ना ही पहले सा वो प्यार अब तू खुलूसियत के ना जाम भर दाग से ना दामन चाक कर जो चमन कली की ना रही उस पे जां तू ना निसार कर वक़्त कि मार से सहरा हुआ वो बाग़ कब यहाँ हरा हुआ उस पर खिज़ा कि थी नज़र वो अब के किस के नजर हुआ  ये जिंदगी धुएं सा  निगल रही ना मचल के अब तो बहार है आराधना राय "अरु" 

आबाद होता

साभार गुगल सज़दा गर तेरी पनाहों में होता असर कुछ इन दुआओं में होता मेरा घर रोशनी से आबाद होता इमान गर तेरी वफाओं में होता मंदिर ना मस्जिद ना खाक होता खुदा गर तेरी इन शिराओं में होता दिल का मकान ना यह खाली होता तिरा नाम गर इन सितारों में होता चाँद रात उन का  हसीं दीदार होता चेहरा गर उनका ना हिज़ाबों में होता बसेरा अपना तेरे गाँव में "अरु" होता पैगाम तेरा गर इन फिजाओं में होता आराधना राय "अरु"

ग़ज़ल

गम है, दिल है यां तन्हाई है जिंदगी अपनी नहीं पराई है ख़्वाब आँखों में उतर आए है दिल में इस कदर तू समाई है तेरा वादा वादा नहीं लगता है दिल ने  प्यार कि सज़ा पाई है  जीने के लिए  दर्द  ताउम्र बहुत है  सुन रहे है इस पर भी रुसवाई है  लिख गई है इबारत सी पेशानी पे  लगा  हर शय पे तेरी शहंनशाई है देर से बड़ी देख रही है वो मुझको जान पे "अरु" अब तो बन आई है आराधना राय "अरु"

देखा कविता

गरज़ कर बादलों को बरसते देखा सूरज को छिपते आकाश में देखा  कन्धों से आंचल को उतरते देखा हया को बेहयाई बना कर भी देखा दाग़ दामन में कितने लगे ये देखा माँ, बेटियों कि लाज़ उतरते  देखा देव तुझे ना आसमां से उतरते देखा आँसुओं का दर्द ढल पिधलते ही देखा वेदना  मूक थी क्या किसीने ना देखा  पिता, पुत्र को सदाचारी बनते हुए देखा  दुर्योधनों को ना कभी संवारते हुए देखा पूजते मंदिरों में देवी घंटों तक उन्हें देखा लाज़ नारी कि  लूट- कभी बिलखते  देखा "अरु" जीवन को सहन कर जलते  देखा बाज़ार के खिलोनों की तरह बिकते देखा आराधना राय "अरु"

दिल नज़्म

 सौ-सौ किए सवाल दिल -ए  नाशाद कि खातिर  ढूंढा किए जवाब ख्वाबों कि उम्मीद कि खातिर  धडकता है ना जाने कितने अहसास लिए दिल क्या - क्या ना सहा इस में छिपी याद कि खातिर सब कुछ करीने से सज़ा रखा है जाने किसके लिए इक दिन बदल जाएगा सब किस सय्याद कि खातिर शाद हुआ कभी नाशाद हुआ दिल दामन से लिपट कर दिन साल महीने गिनता रहा किस मीयाद कि खातिर खाली मकान नहीं रख लिया सामान फिर क्यूँ तिरा  बताता नहीं कुछ जी रहा है दिल ए बर्बाद कि खातिर रगों  से होकर ज़िस्म तक खून कि बात कहता है दिल आवाज़ दे रहा है परिंदों को ''अरु" फरियाद कि खातिर आराधना राय  ''अरु"

नज़्म ------------ गम

मर गया कोई रोना भी नही आया उसको दुनियाँ ने कितना अकेला बनाया मुझको रौंद कर पूछते है फूल  नहीं भाया उसको रौशनी के लिए अँधेरा तूने बनाया  मुझको खुद जी कर मौत का कफ़न पहनाया मुझको अपने निवालों के लिए भूखा मरवाया मुझको बिक गए दर्द मेरे गीत बन बहलाया  किसको आज नहीं कल कौनमार कर पछताया  किसको इंसानियत मर गई  ज़िक्र तक ना भाया उसको आराधना राय "अरु"

अतुकांत नज़र आएगी

साँस  बन कर  मेरे साथ रह जाएगी जिंदगी में सिर्फ तू नज़र आएगी मैंने जो सोच कि दीवारें बना कर रखी उन दीवारों से भी तू पार चली जाएगी ढूंढता फिरता हूँ बस्ती बस्ती सहरा सहारा तू किसी कहानी के किरदार सी नजर आएगी आराधना राय "अरु"