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धुँआ

धुँआ ----------------------------------- धुँआ - धुँआ सी ज़िन्दगी ना मचल अब के बहार है खिज़ा की पहल हो चुकी ना देख जश्न- ए -बहार है वो तड़प रही ना मकाम अब ना ही पहले सा वो प्यार अब तू खुलूसियत के ना जाम भर दाग से ना दामन चाक कर जो चमन कली की ना रही उस पे जां तू ना निसार कर वक़्त कि मार से सहरा हुआ वो बाग़ कब यहाँ हरा हुआ उस पर खिज़ा कि थी नज़र वो अब के किस के नजर हुआ  ये जिंदगी धुएं सा  निगल रही ना मचल के अब तो बहार है आराधना राय "अरु" 

आबाद होता

साभार गुगल सज़दा गर तेरी पनाहों में होता असर कुछ इन दुआओं में होता मेरा घर रोशनी से आबाद होता इमान गर तेरी वफाओं में होता मंदिर ना मस्जिद ना खाक होता खुदा गर तेरी इन शिराओं में होता दिल का मकान ना यह खाली होता तिरा नाम गर इन सितारों में होता चाँद रात उन का  हसीं दीदार होता चेहरा गर उनका ना हिज़ाबों में होता बसेरा अपना तेरे गाँव में "अरु" होता पैगाम तेरा गर इन फिजाओं में होता आराधना राय "अरु"

ग़ज़ल

गम है, दिल है यां तन्हाई है जिंदगी अपनी नहीं पराई है ख़्वाब आँखों में उतर आए है दिल में इस कदर तू समाई है तेरा वादा वादा नहीं लगता है दिल ने  प्यार कि सज़ा पाई है  जीने के लिए  दर्द  ताउम्र बहुत है  सुन रहे है इस पर भी रुसवाई है  लिख गई है इबारत सी पेशानी पे  लगा  हर शय पे तेरी शहंनशाई है देर से बड़ी देख रही है वो मुझको जान पे "अरु" अब तो बन आई है आराधना राय "अरु"

देखा कविता

गरज़ कर बादलों को बरसते देखा सूरज को छिपते आकाश में देखा  कन्धों से आंचल को उतरते देखा हया को बेहयाई बना कर भी देखा दाग़ दामन में कितने लगे ये देखा माँ, बेटियों कि लाज़ उतरते  देखा देव तुझे ना आसमां से उतरते देखा आँसुओं का दर्द ढल पिधलते ही देखा वेदना  मूक थी क्या किसीने ना देखा  पिता, पुत्र को सदाचारी बनते हुए देखा  दुर्योधनों को ना कभी संवारते हुए देखा पूजते मंदिरों में देवी घंटों तक उन्हें देखा लाज़ नारी कि  लूट- कभी बिलखते  देखा "अरु" जीवन को सहन कर जलते  देखा बाज़ार के खिलोनों की तरह बिकते देखा आराधना राय "अरु"

दिल नज़्म

 सौ-सौ किए सवाल दिल -ए  नाशाद कि खातिर  ढूंढा किए जवाब ख्वाबों कि उम्मीद कि खातिर  धडकता है ना जाने कितने अहसास लिए दिल क्या - क्या ना सहा इस में छिपी याद कि खातिर सब कुछ करीने से सज़ा रखा है जाने किसके लिए इक दिन बदल जाएगा सब किस सय्याद कि खातिर शाद हुआ कभी नाशाद हुआ दिल दामन से लिपट कर दिन साल महीने गिनता रहा किस मीयाद कि खातिर खाली मकान नहीं रख लिया सामान फिर क्यूँ तिरा  बताता नहीं कुछ जी रहा है दिल ए बर्बाद कि खातिर रगों  से होकर ज़िस्म तक खून कि बात कहता है दिल आवाज़ दे रहा है परिंदों को ''अरु" फरियाद कि खातिर आराधना राय  ''अरु"

नज़्म ------------ गम

मर गया कोई रोना भी नही आया उसको दुनियाँ ने कितना अकेला बनाया मुझको रौंद कर पूछते है फूल  नहीं भाया उसको रौशनी के लिए अँधेरा तूने बनाया  मुझको खुद जी कर मौत का कफ़न पहनाया मुझको अपने निवालों के लिए भूखा मरवाया मुझको बिक गए दर्द मेरे गीत बन बहलाया  किसको आज नहीं कल कौनमार कर पछताया  किसको इंसानियत मर गई  ज़िक्र तक ना भाया उसको आराधना राय "अरु"

अतुकांत नज़र आएगी

साँस  बन कर  मेरे साथ रह जाएगी जिंदगी में सिर्फ तू नज़र आएगी मैंने जो सोच कि दीवारें बना कर रखी उन दीवारों से भी तू पार चली जाएगी ढूंढता फिरता हूँ बस्ती बस्ती सहरा सहारा तू किसी कहानी के किरदार सी नजर आएगी आराधना राय "अरु"

कुरुक्षेत्र

ईष्या द्वेष के मारों का हाल ना पूछे स्वार्थ हुआ मजहब कुछ हाल ना पूछे -------------------------------------------------- स्वार्थ से हुए अंधे धृतराष्ट्र दुःशासन यहाँ सभी कर्म बन गया किसका कुरुक्षेत्र का रणक्षेत्र तभी आस्था के प्रश्न पर सब यहाँ मारीच से निकले ईश्वर जिनके लिए छलिया कपटी धूर्त निकले मंदिर , मस्जिद, गिरजा बना कर पूजते है सभी वक़्त आने पूजा का घर जला जाता है हर कोई आज पूज लो भगवान जितने बना बैठे हर कही समय कि धारा में वो भी बह जायेगे कहीं ना कहीं बिजलियों के बीच रहता है जैसे हर यहाँ हर कोई गरीब का साया बिना बात छीन लेता है हर कोई ईशु, मीरा, सुकरात ज्ञानेश्वर बिष पी जी गए सभी मसीहा आ कर दुनियाँ में रो कर क्या गए यहोँ सभी भगवान को परख डालोगे परख नालियों में तूम सभी स्वार्थ के क्या कहने स्वयं को विधाता बुलाते हो सभी आराधना राय "अरु"

नज़्म,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, गीत

गीत बहारों के नाम लिखती हूँ मैं तेरा इंतज़ार करती हूँ रोशनी कम ना थी मेरे दिल में बस तेरा इंतखाब करती हूँ सुरमई शाम जब भी आती है  साथ  खुशबु  संग लाती है लौट आएगी तेरे दामन में बच कर ख़ुशी कहाँ जाने वाली है मैं सजा लुंगी चाँद तारों को नूर कि इबादत  कहाँ होने वाली है रौशनी से कहाँ दिल खाली है  किस्मत  की शाम ना ढलने वाली है आराधना राय "अरु"

एक बदनाम औरत

दुनियाँ के दोहरेमापदंड पर जीवन ना जी के उसने उसी जीवन को स्वीकार किया जो उसका का था,जिसे जीने के लिए, किसी से छिपना नहीं पड़ा।                                             -----------------------------------------------------------------------------------------------------------------                                     " ज़र्द चेहरा गुम है रंगत दिल कहे कुछ और है                        बढ़ गई मुश्किल खुदाया हैरां मुस्लसल  कौन है " सुंदर दो जोड़ी आँखे चेहरे पर टिका कर जब उसने पूछा तो राजन मन ही मन में शेर  कह उठा , हालांकि शायर नहीं था वो पर उर्वशी को देख कर हो जाना चाहता था । "दो मिनट रुकेगे" , कार में बैठे राजन से उसने कहा  । कोई बात नहीं आप जाए में इंतजार करूँगा, गोरा सुंदर चेहरा , सुडौल देहयिष्ट, शिफोन ...

नज्म चेहरा

नज्म चेहरा तेरा चेहरा मुझे रकीब सा लगता है दूर होकर भी  करीब  सा लगता है दिल जल कर सुलग नहीं उठता है आज़माता हुआ गरीब सा लगता है दहर की आग में शहर  जलता है कैसा रिश्ता तुझ से मेरा लगता है सताए हुए है चोट दिल पर लगी है ना जाने कौन ये मुझ पे हँसता है आराधना राय "अरु"

अप्सरा को मात

अप्सरा को मात ------------------------------ अप्सराओं में सब से सुंदर अप्सरा ने सोचा आज पृथ्वी लोक जा के वहाँ कि सुंदर स्त्रियों से मिले । जल्दी जल्दी में  वो  इक उद्यान में आ  गई , किस्मत से वहां सब लडकियाँ और लड़के खड़े थे दिन भी विचित्र 14 फरवरी ।                                                 दृश्य- 1                                 (उर्वशी इक लड़के से पूछती है ) उर्वशी-- वत्स ये पुष्प क्यों ? लड़का- आंटी कौन से टी. वी प्रोग्राम के लिए मुझे बकरा बना रहीं है ? (ऊपर से नीचे उर्वशी को देख कर ) उर्वशी को अपनी गलती का भान होता है और तुरंत गेटउप बदलती है । एक सुंदर लड़की के रूप में फिर खड़ी हो जाती है  । तभी एक लड़का 18-20 साल का आता है हाथों में गुलाब लिए  ।   लड़का -  विल यु बी मय वेलेंटाइन ?               ...

नज़्म

तेरे जाने के बाद तुझसे गिला नहीं शिकवा,शिकायत आरज़ू ,बाकी नहीं पत्थर है दिल नहीं जिंदगी में जुस्तजू तेरे सिवा कोई नहीं आती बहारें लौट जाए तेरे हसीन मकान से ऐसा कब हो सका है किसी चारागार में जीने के लिए काफ़ी है मेरी टूटी सी झोपड़ी तेर फरेबी वादों से अच्छी है खरी बात नए मरहले अभी है इन मरहलों के बाद आराधना राय "अरु"

क्या देखते हो

क्या देखते हो ठहरे हुए पानी में क्या देखते हो गुज़रे वक्त की पेशानी पे क्या देखते हो छलक जाती है मेरी आँखे क्यों पोछते हो जुल्म कर जाते हो हर बार मुझ पे चोट को आकर क्या कभी देखते हो दर्द पूछा होता ठहर जाने का मुझ से खो चुकी दरिया की रवानी क्या देखते हो हँस रहा था सारा ही जहान मुझ पर मेरी लाचारी को क्यों तूम देखते हो हँस तो दिए तुम मेरे छाले देख कर आँखों के मेरे जाले देख कर किसलिए कुफ्र रोज़ ढाते हो तुम मंदिर ,  मस्जिद हर रोज़ गिरते हो तुम आराधना राय "अरु"

देखिये

मेरे पहलू में भी आ कर देखिए दिल से दिल मिलाकर देखिए मेरे हमदम की गाई ग़ज़ल साथ मेरे गुनगुनाकर देखिए नफरतों कि बस्तीयों को भूल कर प्यार कि दुनियाँ बसा कर देखिए मुश्किलों में तो थपेड़े धुप के साथ मेरे भी खा कर देखिए आप के कन्धे पे रखा है सर प्यार से थपथपा कर देखिए लाए है तोहफ़े में हम जां और ज़िगर आप नजरें उठा कर देखिए ग़र खता कोई नहीं कि आपने आँखों से आँखों मिला कर देखिए चाँद तारों से भला क्या पूछना "अरु" खुद ही आकर देखिए आराधना राय "अरु"

दोस्तो देख लो

करम कैसा ये उल्फतो का अजब है दोस्तो देख लो पड़े हैं  उनकी  रहमतो पर गज़ब  दोस्तो देख लो खतावार  हुआ खुद  गम का  शिकार रास्ता देख लो रहम यहाँ किस के दिल के करीब  दोस्तों देख लो कड़ी दरवाजे की बंद कर के दुनियाँ  से वास्ता देख लो आँख बंद कर के सहरा -ओं के सराब  दोस्तों देख लो बड़े अदब का क़ायदा रिवायत उनकी कायदा देख लो हर इक पल  तराशा उन का हिसाब  दोस्तों देख लो आराधना राय "अरु"
अधुरा गीत -------------------- गीत अधुरा रह गया मौन अनकहा रह गया प्रीत की बतिया  कही मन  तृष्णा  कह गया बसंत रीता  रह  गया हर रंग फीका रह गया साँझ विरहन भाई नहीं मौसम अधुरा रह गया साँझ की बेला का दीया सिसकता हुआ रह गया चूड़ियाँ टूटी सुहाग की हिय का गहना खो गया सरहद पे सिंदूर पुछ गया देश के नाम पीया तू गया आँसुओं से स्वपन लिखा पीड़ा में उमड़ के कह गया धरोहर रख कर कैसी गया आँखों में आँसू  छोड़ गया अपनी यादों की निशानी सूनी कलाई में देकर गया देश मेरा वीरान  हो गया बेटी का दर्द बेगाना  गया  रिश्तों को तिलांजलि में मोल-भाव में  व्यर्थ गया दुल्हन की लाज ले  गया डोली क्या अर्थी सजा गया  सोता रहा चादर ओढ़ कर बेटी का अपहरण हो गया वेदना का मुँख खुल गया जीवन,मृत्यु के नाम गया तरस अन्नदाता अन्न को प्राणों का मोह ही रह गया काज़ल आँखों का बिध गया हदय पे आघात कर के गया मूक हो पथ पर तूम बैठे हो  जिव्हा से मानों  स्वर गया  दुःख में मुस्कान बिखरा गया अंधकार की ज्योति  हो गया...

तुम्हारा

ग़ज़ल ------------------------------------------------------------------------------------------------- बे वजह नाम तो मेरा न पुकारा होगा आपके प्यार का ये एक इशारा होगा जख्म को मेरे इक तेरा सहारा होगा अभी भरा है  कभी तो ये  हरा होगा  दर्द सीने मे उसके भी उठता होगा   चाँद तन्हा है इक दिन हमारा होगा  कच्ची मिट्टी के घर मे  गुजारा होगा  शहर का तुनक मिज़ाज़ ना प्यारा होगा .   इन अंधेरों का कोई  तो उजाला होगा   दर्द सीने का भला किसको गवारा होगा   माँ का दिल भी दर्द से तड़पा होगा अरु ,   चोट खा कर जब अश्क उमड़ता होगा आराधना राय "अरु"

कहे क्या

कहे क्या वो आज़माने आये है खुद का जी बहलाने आये है कहाँ से रंज इतना संग लाये है बिन पिये ही वो लडखडाये है किसी सोच से वो टकरा आये है इक मुद्दत के बाद वो मुस्कुराये है खुदी का सौदा जब कर आए है कहे क्या किस बात पर पछताये है वक़्त की  चाल  देख आए है आईने से आज क्यों वो घबराये है बड़े नाज़ से वो  समझाने आए  है लगा जैसे वो हमारे "अरु "हमसाये है आराधना राय "अरु"