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वो फुटपाथ

वो फुटपाथ पर दिन भर सामान बेचती थी  रात भर जिस्म का वो भी बाज़ार देखती थी  इश्क़ के नाम पर वो पैगाम क्या भेजती थी  वहशियत का रोज़ वो इनाम खुद झेलती थी   हाथ -फैला  हर  रोज़ चन्द सिक्के देखती थी  अपने हाथ में वो क़िस्मत का नाम देखती थी  उम्र भर जाने किसकी वो क्यू राह देखती थी   जीने कि चाह में रोज़ ही मर कर वो देखती थी  नज़्म आराधना राय 

क्या पाओगे

आज हूँ तुम कल मुझे नहीं तुम पाओगे मेरी आवाज़ भी सुन नहीं तुम यू पाओगे दिल ही दिल में तुम भी खूब  पछताओगे मुझ को खोकर बता तुम यहाँ क्या पाओगे रूठ कर तुम भला क्या मुझ से दूर जाओगे ज़र्रे -ज़र्रे में मुझको ही तुम  बिखरा पाओगे उलझनें अपनी ही खुद तुम यू बढ़ा जाओगे हर जगह वीरान सी मेरे बगैर तुम पाओगे ना रो सकोगे तुम फिर ना यू मुस्कुरओगे दिल के टूटने कि आवाज़ ही सुन पाओगे मेरे ज़ख़्मों को कुरेद कर तुम क्या पाओगे मैं जो रोइ तो तुम भी तो अश्क़ बहाओगे नज़्म  .... आराधना राय

सुना मुझे

           सुना मुझे ------------------------------------------------- ज़िन्दगी कोई और कहानी  तू सुना मुझे भूख और प्यास कि बातें यू ना सुना मुझे मेरे  हालातों ने ही बहुत मार गिराया मुझे अपनी क्या बात यू  ही अब मैं बता दू तुझे मेरे रोने पर क्यों  ना कभी रोना आया उसे  मेरा हमदर्द था बाज़ार में ले आया वो मुझे अपने  हाथों में डोर बांध ले कर आया मुझे मैं उसकी कठपुतली हूँ ये बताने आया मुझे आराधना राय

गीत वहीं गाते हो

तुम गीत वहीं फिर गाते हो जो उर में आन समाता है उषा कि प्याली में रचे बसे रश्मि का दीप जलाता है, अपराह्न समय भानू वीर अग्नि सा बरस कर जाते है ग्रीष्म ऋतु से हिय में क्यों संताप प्रहार कर के जाते है निशा कि चादर को ओढ़े चंद्र मन ही मन मुस्काता है चपल चाँदनी कि आभा से स्निग्ध् स्नान जग पाता है निंद्रा कि बाहों में जब मंद समीर मन को बहलाता है तारों कि चुनरीया ओढ़े कोई स्वपन नए से दे जाता है गीत मुझे हर दिन ही दिवस रात्रि में भेद बतलाता है जाने वाले थोड़ा रुक जा दिन ही रीता सा जाता है आराधना राय    

ख़्वाब आँखों में

-------------------------------------------------------------- किस  कि आहट को सुन कर वो चले आते है ख़्वाब से हमारी आँखों में वो बसा कर जाते है कोई साज़ -ओ -सामान नहीं साथ वो लाते है दिल के आईने में बात कर के वो चले जाते है कोई शिकवा नहीं मुझसे उनको ये बता जाते है वो तस्वुर है मेरा मुझसे ही बात कर के जाते  है दिल के शहर के अफ़साने को बयां कर जाते  है तन्हा होते हुए भी अरु वो महफ़िल सजा जाते है आराधना राय 

ढूंढते रहे

ढूंढते रहे =============================== तेरी चाहत लिए ना जाने कहाँ यू घूमते  रहे मंज़िल कि तलाश में जाने क्या यू ढूंढ़ते रहे वादा नहीं तुझसे फिर सनम तुझे ढूंढते रहे बोझ कांधे उठा कर सदियों यू ही घूमते रहे रात दर्द की खामोशियों में तुझे क्यू ढूंढते रहे ख्वाब था फिर भी सिरहाने तुझे यू ही ढूंढते रहे किस कशमकश में थे क्यों ये बात पूछते ही रहे तेरे घर का पता किसी और से हम क्यू पूछते रहे तेरे बगैर ज़िन्दगी काटी और तुझे  भूलते ही रहे इसी सोच में जाने किस किस को खुदा बोलते रहे आराधना राय

गीत

गीत जानवर इंसानियत सीख जाएगा इंसान, इंसान भी नहीं बन पाएगा पत्थर भी एक दिन बोल कर जाएगा मानव तू भी पाषाण ह्रदय हो जाएगा संवेदना हीन वेदना क्या जान पाएगा कोई गीत यू ही अधूरा ही रह जाएगा अस्मां को क्या कोई यू झुका पाएगा हौसला है गर धरणी धीर कहलाएगा आराधना राय

सभ्यता के नाम

सभ्यता के नाम --------------------------------------- मेरे आँगन में भोर कि लालिमा छाई बिटिया तू जिस दिन घर में मेरे आई मलीन मुख पर क्रांति सी ले कर आई  मुझे लगा नन्ही परी मेरे घर पर आई अश्रुओं कि धार  किसी भी ने ना बहाई तू पूरे  घर को थी मन ही मन में सुहाई आज में दुनियाँ के रुख को देख घबराई तीरे किसने  सभ्यता के नाम के चलाये छींटा कसी देख़ बात ना समझ में आई क्यों परिधान कि बात यू हर घड़ी उठाई देखा नहीं महिला विश्व में सार्थक हो गई कहीं कल्पना ,कही एमली ,तो सैली राइड किरण अवतरित हो धूमिल नहीं हो पाई बेटी के अंतस कि बात क्या समझ  पाये जब किसी क्रांति में एक स्त्री दल होता है समाज भी जा के वही सगठित होता है जब कोई बेटे बेटी में अंतर नहीं पाता है स्त्री पुरुष के नाम कि दुहाई नहीं लगता है  नव किसलय विचारों का हनन नहीं होता वही समाज सभ्यता के गीत ही गा पाता है आराधना राय  

फूल

 जब फूल किसी ने यु चुराया होगा शाख पे क्या गुज़री जान पाया होगा वो उदासियों में मुस्कुराया तो होगा नाम उसके जब जुबां पर आया होगा कोई ना कोई किसी का हम ज़ुबां होगा किसी के अश्क का अरु कोई सिला होगा आराधना राय

मुमकिन ना हुआ

मुमकिन ना हुआ -----------------------------------------------                         वो मेरी बात को कभी समझा ना था वो आईना था मगर दरका हुआ सा  करुँ क्या बात मैं खुद अपनी ज़ुबाँ से  किसी कि आस में कब से बैठा हुआ था  वो मेरा था मगर मुझ से रूठा हुआ था जाने किस बात ने उसको रोका हुआ था  परस्तिश कर सकूँ उसको कब हुआ था  रिश्ता अहसास का जाने क्यों  हुआ था वो मेरे सामने कभी  यू आया ही नहीं था निगाहों से करें बातें  मुमकिन ना हुआ था उसकी मेरी बातें सामने ही कब हो सकी थी मेरी उसकी हर एक बात पसे दीवार हुई थी   आराधना राय ----------------------------------------- दरका -----चटका हुआ , पसे दीवार------------- दीवार के पीछे से। परस्तिश,,,,,,,,,,,,,,सज़दा , झुकना किसी के आगे Already published in vishwagatha 2015 jun

ना पाया था

ना पाया था ------------------------ वो उसका दर था जहा मैंने सर झुकाया था ये अलग बात है वो मुझे देख ना पाया था मेरी  हर बात पहाड़े सी उसे ज़बानी याद थी ये और बात है मुझे वो कभी कह ना पाया था मेरे इकरार को इनकार उसने समझ लिया था उसने मुड़ कर कभी हमें फिर देखा भी नहीं था मेरी आँखों ने जाने क्यों उसका रस्ता निहारा था ये और बात है उसे मेरे दिल ने बारहा पुकारा था आराधना राय

निभाया था

अपनों ने जब कोई मुझ से रिश्ता ना निभाया था तो उसी ने आकर गम कुछ इस तरह बटाया था मुझे  नहीं उसने मेरे ज़ख्मों को गले लगाया था  कौन कहता है उस रोज़ वो कुछ भी ना लाया था वो किस तकलीफ़ में था ये बात कह ना पाया था दिल कि हज़ार खुशियाँ वो मुझे ही  देने आया था मेरे मकान के दरों -दीवार कब से यू ही ढह रहे थे वो मेरा टूटा हुआ घर फिर बनाने ही तो आया था सरे बाज़ार वो मुझ से कुछ भी तो कह ना सका था वो मेरे दामन को कीचड़  से ही  बचाने तो आया था    आराधना राय

अपना हो गया

किस कि क्या यू भी  खता थी सज़ा कौन सी ये वो  सह गया। बात कुछ भी ना उनसे यू  हुई थी हंगामा सा हर तरफ क्यों हो गया। तेरे शहर में हो कर हम  गुमनाम थे तुझ से यू भी हम कभी  अनजान थे बिन कहे ये भी क्या फ़साना हो गया तेरी अदा पे हर कोई  दीवाना हो गया कहने को वो फ़क़त बस ग़ैरो सा ही था उसका मेरे  दिल में ठिकाना सा  हो गया रिश्ता कुछ ना था उससे वो मेरा हो गया  अपनों से भी बढ़ कर वो  अपना हो गया आराधना राय

मिट्टी में दफ़न आहट

इमेज़ साभार गुगल ------------------------------------------------------------------------------------------------------- मिट्टी में दफ़न किसी की आहट थी देखा तो वो भी  चाहत किसी की थी मासूम चेहरा कोई रवानी ढूढ़ता था हवा का ज़हर भी उसी को सूँघता था तमाशाई खुद कोई तमाशा देखता था  मौत का सामान जाने क्यू  बेचता था शहर में  पसरा जाने क्यों ये सन्नाटा था  निशाने पर आज भी कत्ल होने वाला था लूट कर चला गया  क्यू मानने वाला था हसरतों का जनाज़ा उठने ही ये वाला था देखा सभी ने ये डोली अभी उठी ही तो थी दुल्हन सी आग में वो बस जली ही तो थी आराधना राय

तेरी हर बात

साभार गुगल इमेज़  --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- तेरी हर बात पर एतबार है क्यू  मुझे ज़िन्दगी तू फिर मिल गई राह में मुझे गीत कोई अधूरा गा कर होंठ चुप हो गए  तेरी ही रूह हूँ अब तो  महसूस कर मुझे सदियों से हूँ यही  ही किसी इंतज़ार में ख़्वाब हूँ पलकों से अपनी चुन ले तू मुझे वक़्त कि दीवार पे टिकी एक तस्वीर हूँ मैं तेरा ही तसव्वुर हूँ ये बात याद हैं मुझे   आराधना राय 

नज़्म -------------तेरे ख़त

आभार गुगल इमेज़ ---------------------------------------------------    तेरे ख़त मुझे आज भी  क्यू  देर तक यू रुलाते है    यादों कि कैद में थमीं बातों में  जब मुस्कुराते है  धुँधले हो चुके स्याह शब्द  कुछ कह से जाते है    आँसुओ  के धब्बों में छिपे राज़ हरे से हो जाते है    वक़्त के मोड़ पर खड़े यू ही जब कहीं ठहर जाते है    उनकी बातों के सायों को इंतज़ार  में खड़े पाते  है   कागज़  ना दवात कलम लिखने वाले लिख जाते है   बातों के अहसास अब किसी के समझ नहीं आते है   किसी के ऑंसू भी कोई दास्तां नहीं सुना कर  जाते है  दर्द दिल के दिल में ही दफन से हो कर क्यू रह जाते है    आराधना राय  

दर्द

साभार गुगल इमेज ================================================================ दर्द जब  ज़ुबां देता है , खूबसूरत अहसास को  जन्म देता है  पानी में उठते बुलबुलों कि तरह रोज़ मरते है रोज़ जीते है  क्यू फ़से  है इस कफ़स में यहाँ ऐसी  उलझन में यू रहते है  शिकवा हम यहाँ किस से करे मेरी दुनियाँ ही रूठ के बैठी है एक तेरे नाम पे जीते है ,हॅंस के दुख भी अब  झेल ही लेते  है  इश्क है तुम से खुद को बहला कर हम भी तो जीते ही  रहते है  आराधना राय

मंज़िल ना मिली

ज़िन्दगी जब भी जैसी भी रही उसी के क़ायदे कानूनों  में ढ़ली वक़्त का तक़ाज़ा करती ही रही  ढलती शाम टूटे जाम सी  मिली  सफऱ में बहुत दूर हमें जाना था रास्तों में कब अपना ठिकाना था हर मोड़ पर बस वायदे सी मिली ज़िन्दगी तू हमें क्यों देर से मिली रास्तों के बाद बस रास्ते ही मिले मकां मिला ना हमें मंज़िल ही मिली आराधना राय

बता जाती है

बता जाती है ------------------ बात दिल को छू कर यू  चली जाती है ज़िंदगी अपनी  कीमत ही बता जाती है दुनियाँ में  हर शए ही बिकने  जाती है गर सही कीमत कहीं उसे मिलजाती है दफ़न , कफ़न , भी जो लोग नहीं पाते है उनके हिस्सें में बस सिक्के नहींआते है अस्मत से  किस्मत तक खरीद जाते है खनकते सिक्कों को खुदा भी कह जाते है दिल कि उम्मीद पर जीवन जो बिताते है उनकी क़ीमत तो खुदा भी नहीं लगते है चाँद तारे भी सामने  मंद से  पड़ जाते है वो  ही सूरज बन दुनियाँ को  चमकाते है  आराधना राय