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क्या पाओगे

आज हूँ तुम कल मुझे नहीं तुम पाओगे
मेरी आवाज़ भी सुन नहीं तुम यू पाओगे

दिल ही दिल में तुम भी खूब  पछताओगे
मुझ को खोकर बता तुम यहाँ क्या पाओगे

रूठ कर तुम भला क्या मुझ से दूर जाओगे
ज़र्रे -ज़र्रे में मुझको ही तुम  बिखरा पाओगे

उलझनें अपनी ही खुद तुम यू बढ़ा जाओगे
हर जगह वीरान सी मेरे बगैर तुम पाओगे

ना रो सकोगे तुम फिर ना यू मुस्कुरओगे
दिल के टूटने कि आवाज़ ही सुन पाओगे

मेरे ज़ख़्मों को कुरेद कर तुम क्या पाओगे
मैं जो रोइ तो तुम भी तो अश्क़ बहाओगे

नज़्म  .... आराधना राय


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आज़ाद नज़्म पेड़ कब मेरा साया बन सके धुप के धर मुझे  विरासत  में मिले आफताब पाने की चाहत में नजाने  कितने ज़ख्म मिले एक तू गर नहीं  होता फर्क किस्मत में भला क्या होता मेरे हिस्से में आँसू थे लिखे तेरे हिस्से में मेहताब मिले एक लिबास डाल के बरसो चले एक दर्द ओढ़ ना जाने कैसे जिए ना दिल होता तो दर्द भी ना होता एक कज़ा लेके हम चलते चले ----- आराधना  राय कज़ा ---- सज़ा -- आफताब -- सूरज ---मेहताब --- चाँद

गीत---- नज़्म

आपकी बातों में जीने का सहारा है राब्ता बातों का हुआ अब दुबारा है अश्क ढले नगमों में किसे गवारा है चाँद तिरे मिलने से रूप को संवारा है आईना बता खुद से कौन सा इशारा है मस्त बहे झोकों में हसीन सा नजारा है अश्कबार आँखों में कौंध रहा शरारा है सिमटी हुई रातों में किसने अब पुकारा है आराधना राय "अरु"

गीत हूँ।

न मैं मनमीत न जग की रीत ना तेरी प्रीत बता फिर कौन हूँ घटा घनघोर मचाये शोर  मन का मोर नाचे सब ओर बता फिर कौन हूँ मैं धरणी धीर भूमि का गीत अम्बर की मीत अदिति का मान  हूँ आराधना