Skip to main content

क्या पाओगे

आज हूँ तुम कल मुझे नहीं तुम पाओगे
मेरी आवाज़ भी सुन नहीं तुम यू पाओगे

दिल ही दिल में तुम भी खूब  पछताओगे
मुझ को खोकर बता तुम यहाँ क्या पाओगे

रूठ कर तुम भला क्या मुझ से दूर जाओगे
ज़र्रे -ज़र्रे में मुझको ही तुम  बिखरा पाओगे

उलझनें अपनी ही खुद तुम यू बढ़ा जाओगे
हर जगह वीरान सी मेरे बगैर तुम पाओगे

ना रो सकोगे तुम फिर ना यू मुस्कुरओगे
दिल के टूटने कि आवाज़ ही सुन पाओगे

मेरे ज़ख़्मों को कुरेद कर तुम क्या पाओगे
मैं जो रोइ तो तुम भी तो अश्क़ बहाओगे

नज़्म  .... आराधना राय


Comments

Popular posts from this blog

कैसे -कैसे दिन हमने काटे है  अपने रिश्ते खुद हमने छांटे है पाँव में चुभते जाने कितने कांटे है आँखों में अब ख़ाली ख़ाली राते है इस दुनिया में कैसे कैसे नाते है तेरी- मेरी रह गई कितनी बातें है दिल में तूफान छुपाये बैठे है  बिन बोली सी जैसे बरसाते है

आना

घर भले ही खाली हाथ आ जाना गुज़रा वक्त तूम साथ ले आना हमने जाना नही तुमने माना नहीं कब हुई दोस्ती हमने पहचाना नहीं आसमान मेरे सर पर हमेशा रहा छांव एक टुकड़ा सही संग ले आना जब भी आना मेरे घर तूम ही आना सोई सी  इस नज़्म को बोल दे जाना आराधना राय "अरु"

श्रद्धांजलि

मेरा बचपन ही साथ लें गए पिता मेरे तुम ईश्वर हो गए मेरे जीवन के वातायन बन मुझे अपने सपनें भी दें गए मुझे नव जीवन यू  देने वाले सागर तीरे ही   पार वो हो गए इस जीवन से विदा लेने वाले उस ईश्वर के कण में खो गए (स्व श्री कैलाश चन्द्र शर्मा  को नमन ४ बरसीं पर))